| Author | Jaishankar Prasad |
| Genre | Fiction |
| Language | Hindi |
| Pages | 281 |
| File Size | 6.4 |
Book Summary
जयशंकर प्रसाद का ऐतिहासिक नाटक “चंद्रगुप्त” मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य के जीवन पर आधारित एक लोकप्रिय रचना है। यह नाटक नंद वंश के पतन और चाणक्य की कूटनीतिक कुशलता को दर्शाता है, जिसने भारत को विदेशी आक्रमणों और आंतरिक खतरों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कहानी में चंद्रगुप्त के संघर्ष और उनकी नेतृत्व क्षमता को विस्तार से दिखाया गया है, जिसमें चाणक्य की चालाकी और देशभक्ति की झलक साफ नजर आती है। हालांकि यह नाटक ऐतिहासिक तथ्यों पर टिका है, लेकिन इसमें काल्पनिक तत्व भी शामिल हैं जैसे कि चंद्रगुप्त और सिकंदर महान की काल्पनिक भेंट, और एक प्रेम कहानी जो सेल्यूकस की बेटी से जुड़ी है।
यह नाटक हिंदी साहित्य की एक उत्कृष्ट कृति माना जाता है, जिसमें प्रभावशाली संवाद और देशभक्ति की भावना भरी हुई है। इसकी भाषा सरल और प्रवाहपूर्ण है, जिससे यह सभी उम्र के पाठकों के लिए रुचिकर बन जाता है। “अरुण ये मधुमय देश हमारा” जैसे गीत इस नाटक को और भी प्रभावशाली बनाते हैं।
यह पुस्तक खासकर हिंदी साहित्य के छात्रों के लिए उपयोगी है, साथ ही इतिहास प्रेमियों के लिए भी रुचिकर सामग्री प्रदान करती है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के लिए भी यह एक मूल्यवान संसाधन साबित हो सकती है।
Additional Information
‘प्रसाद’ जी न केवल कवि, कहानी-लेखक, उपन्यासकार तथा नाटककार हैं, बल्कि वे इतिहास के मौलिक अन्वेषक भी हैं। हिन्दी में चन्द्रगुप्त मौर्य के सम्बन्ध में विस्तृत ऐतिहासिक विश्लेषण सबसे पहले ‘प्रसाद’ जी ने ही किया था—यह उस समय की बात है, जब चाणक्य-लिखित अर्थशास्त्र का आविष्कार मात्र हुआ था और पुरातत्त्व के देशी-विदेशी विद्वान चन्द्रगुप्त के विषय में लगभग उदासीन थे।
सन 1906 में ‘प्रसाद’ जी ने अपनी विवेचना ‘चन्द्रगुप्त मौर्य’ के नाम से प्रकाशित की थी, जो इस नाटक के प्रारम्भ में सम्मिलित है।
इस उत्कृष्ट नाटक को लिखने की भावना भी ‘प्रसाद’ जी के मन में उसी समय से बनी हुई थी। इसी रूपरेखा पर उन्होंने एक छोटा रूपक ‘कल्याणी-परिणय’ नाम से भी लिखा, जो सन् 1912 में ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ में प्रकाशित हुआ था।
परन्तु वह हिन्दी साहित्य में अनुवाद-युग का समय था, और सन् 1917 में डी.एल. राय का Chandragupta अनूदित होकर हिन्दी में आ गया। अतः लोग मौलिक कृति की अपेक्षा अनुवाद की ओर अधिक आकर्षित हुए। परिणामस्वरूप वही अनुवाद कई रूपों में संशोधित होकर हिन्दी पाठकों के सामने प्रस्तुत किया जाता रहा।
फिर भी ‘प्रसाद’ जी की मौलिक प्रतिभा ने उन्हें अपने ढंग से यह सुंदर ऐतिहासिक नाटक लिखने के लिए प्रेरित किया। और यह अत्यन्त प्रसन्नता की बात है कि वे अपने प्रयास में केवल सफल ही नहीं हुए, बल्कि पूर्ण सफल हुए।
भाषा, भाव, चरित्र-चित्रण—सभी दृष्टियों से इस नाटक का अधिकांश भाग इतना मार्मिक है कि ‘प्रसाद’ जी की लेखनी पर अत्यन्त मुग्ध होना पड़ता है। कुल मिलाकर, हमारी समझ में ‘प्रसाद’ जी के श्रेष्ठ नाटकों में यह सर्वश्रेष्ठ है। इसमें ‘कल्याणी-परिणय’ का प्रसंग भी परिवर्तित तथा परिवर्धित होकर सम्मिलित हो गया है।
