| Author | Vladimir Dediyar |
| Genre | Tantra Mantra Book |
| Language | Hindi |
| Pages | 735 |
| File Size | 30 |
Book Summary
“व्लादिमीर डेडियार” द्वारा लिखित “यंत्र, मंत्र, तंत्र विद्या” भारत की प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं को समझने का एक स्पष्ट और विश्वसनीय स्रोत है। यह पुस्तक यंत्र, मंत्र और तंत्र से जुड़ी प्रथाओं को गहराई से समझाती है और उनके वास्तविक तथा व्यावहारिक उपयोग पर ध्यान देती है।
इसमें पाठकों को आसान भाषा में बताया गया है कि इन प्राचीन विधाओं को रोजमर्रा की जिंदगी में कैसे अपनाया जा सकता है। पुस्तक में कई चरण-दर-चरण निर्देश दिए गए हैं, जो शुरुआती पाठकों के लिए भी समझने में सरल हैं। साथ ही, इसमें कुछ प्राचीन “उपायों” का भी उल्लेख है, जिन्हें जीवन की चुनौतियों को संभालने में सहायक माना जाता है।
इस पुस्तक का उद्देश्य यह दिखाना है कि यंत्र, मंत्र और तंत्र की अवधारणाओं को सही तरीके से समझकर व्यक्ति अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव और मानसिक स्पष्टता ला सकता है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए उपयोगी है जो आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ संतुलित और बेहतर जीवन की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं।
Additional Information
प्रस्तुत ग्रन्थ आचार्य प्रवर समाधि सम्राट, उग्र तपस्वी, मन्त्र-यन्त्र-तन्त्र क्रिया के पारंगत श्री 108 महावीर कीर्ति जी महाराज के प्रवर शिष्य, तपोनिधि, प्रशांत मूर्ति आचार्य गणधर श्री 108 कुंथुसागर जी महाराज तथा गणनी, सिद्धान्त विशारद, सम्यक-ज्ञान शिरोमणि विजयमती माता जी द्वारा अत्यंत परिश्रमपूर्वक लिखित है। इन्होंने अपने गुरुवर आचार्य श्री महावीर कीर्ति जी के उपदेशों एवं प्राचीन गुटकों से सामग्री एकत्र कर इस ग्रन्थ का निर्माण किया है।
यंत्र, मंत्र, तंत्र विद्या अनुवाद विज्ञान के अंग हैं। इनका महत्व आज के भौतिक युग में भी उतना ही है जितना पूर्वकाल में रहा है। किंतु आज इन महान प्रयोगों के ज्ञाता कम हो गए हैं और न ही लोग इनके साधनों और प्रक्रियाओं से परिचित हैं। इसी कारण इन विद्या-विधानों के प्रति आस्था भी नहीं जागृत होती, जबकि बिना आस्था और अभ्यास के किसी भी साधना की सिद्धि संभव नहीं होती।
अज्ञान और प्रमाद के कारण अनेक मन्त्र-यंत्र-तंत्रों की वे सिद्धियाँ आज संभव नहीं हो पातीं जिनका वर्णन प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। विधान का ज्ञान न होने से लोग इन विद्या-विधानों को गलत ठहराने लगते हैं।
मन्त्र साधना की आवश्यकताएँ
मन्त्र साधना के लिए, चाहे कोई भी मन्त्र हो, नव प्रकार की शुद्धियाँ आवश्यक हैं:
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द्रव्य शुद्धि
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क्षेत्र शुद्धि
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काल शुद्धि
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भाव शुद्धि
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आसन शुद्धि
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विनय शुद्धि
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मन शुद्धि
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वचन शुद्धि
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काय शुद्धि
साधक को माला (जो तीन प्रकार की होती है), कमल-जाप्य, हस्तांगुली-माला जाप्य, वस्त्र, आसन और दिशा-बोध का ज्ञान होना भी आवश्यक है। किस साधना के लिए कैसा वस्त्र हो, कैसा आसन हो, कौन-सी मुद्रा हो, और किस दिशा की ओर मुख करना हो, इन सभी बातों का पूर्ण ज्ञान जरूरी है।
साधक को अपनी शुद्धि के लिए सकलिकरण और साधना में विघ्न-निवारण के लिए संरक्षण-क्रिया भी करनी पड़ती है। इनके बिना साधना में अनेक बाधाएँ आती हैं और इच्छित सिद्धि प्राप्त नहीं होती।
मन्त्र, तंत्र और यंत्र का संबंध
मन्त्र द्वारा आन्तरिक शांति जागृत होती है। “मन्त्र” शब्द मन धातु से “ष्टन्” प्रत्यय लगाने से बनता है। जिनसे आत्मा का आदेश जाना जाए, उसे मन्त्र कहते हैं।
तंत्र उन मन्त्रों की प्रक्रिया है, जबकि यंत्र उनका आकार/रूप होता है। सम्पूर्ण द्वादशांग जिनवाणी को सुरक्षित रखने के लिए बनाए गए यंत्र चार्ट के समान हैं, जिनके दर्शन मात्र से पूरे विषय का ज्ञान मिल जाता है। इन यंत्रों का सीधा संबंध मन्त्रों और सिद्धियों से है। श्रद्धा, विधि और विवेक के साथ साधना करने पर सिद्धियाँ निश्चित रूप से प्राप्त होती हैं।
ग्रंथ की संरचना
आचार्य श्री व माता जी ने इन विषयों का समन्वय कर इस ग्रंथ को पाँच खंडों में विभाजित किया है। इनमें शामिल है:
• साधना प्रारम्भ से पूर्व सकलीकरण और संरक्षण
• मुद्राएँ एवं विधियाँ
• विभिन्न सिद्धियों हेतु मन्त्र-विधान
• यंत्रों के आकार
• चौबीस भगवानों के यक्ष-यक्षणियों का वर्णन (चित्र सहित)
• आयुर्वेद से संबंधित विषय-विवेचन
इस प्रकार यह ग्रंथ यंत्र-मंत्र और तंत्र विषय का एक महान एवं अद्वितीय ग्रंथ (लघु विद्यानुवाद) बन गया है।
आभार
इस ग्रंथ को प्रकाशन रूप देने में धर्मोत्साही गुरु-भक्त संगीताचार्य श्री शान्तिकुमार जी गगवाल (प्रकाशन संयोजक) और धर्मप्रेमी श्री नल्लूलाल जी जैन (गुवा), संपादक जयपुर जैन डायरेक्टरी, ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इनके सहयोग और प्रेरणा के बिना यह विशाल कार्य शीघ्र सम्भव नहीं था।
कुंथु विजय ग्रंथ-माला समिति के सभी सदस्यों का भी अभिनंदन योग्य है, जिनके प्रयास से इसका प्रथम प्रकाशन ही इतना प्रभावशाली बन पाया कि इसका प्रकाश दूर-दूर तक फैलेगा और चिरकाल तक रहेगा।
प्रकाशन संयोजक श्री शान्तिकुमार जी ने कहा कि ऐसे महान ग्रंथ का प्रकाशन करना हमारी शक्ति और क्षमता से बाहर था, किन्तु महान आचार्यों के आशीर्वाद और साधुओं के प्रति अटूट भक्ति ने इसे संभव बनाया। भक्ति में अपूर्व शक्ति होती है।
