| Author | Govinda Daas Viniita |
| Genre | Tantra Mantra Book |
| Pages | 100 |
| File Size | 9 |
Book Summary
वशीकरण मंत्र : गोविंदा दास विनीत
यह पुस्तक ऐसी अद्भुत मंत्र और वशीकरण तकनीकों का संग्रह है, जिन्हें सही तरीके से उपयोग करके आप अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। इसमें सरल भाषा में उन मंत्रों और उपायों का वर्णन किया गया है जो शास्त्रों से प्राप्त हैं और वर्षों से प्रभावी साबित हो रहे हैं।
यह पुस्तक न केवल वशीकरण की सटीक विधियों को समझाती है, बल्कि इनका दैनिक जीवन में आसान लागूकरण भी प्रस्तुत करती है। यदि आप अपनी इच्छाशक्ति को मजबूत करना चाहते हैं, प्रेम संबंधों, करियर, व्यवसाय या जीवन की अलग-अलग चुनौतियों में सफलता पाना चाहते हैं, तो यह पुस्तक आपके लिए मार्गदर्शक का काम कर सकती है।
शास्त्रों की प्राचीन ऊर्जा और शक्ति से भरपूर, यह किताब आपके आत्मविश्वास को बढ़ाने के साथ-साथ सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। बेहतर जीवन के लिए सही मंत्र और वशीकरण तकनीकों का जानنا आज की जरूरत है, और यह पुस्तक आपके आत्म विकास का सच्चा साथी बन सकती है।
Additional Information
वशीकरण-मन्त्र-संग्रह
मन्त्र, यन्त्र और तन्त्र
“मन्त्र, यन्त्र और तन्त्र” यह तीनों शब्द वैदिक संस्कृत के हैं। अतएव कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि वैदिक काल से ही मान्त्रिक, यान्त्रिक और तान्त्रिक प्रचलन हुआ है, परन्तु मेरा अनुमान है कि ये तीनों विषय वैदिक काल से भी पूर्व प्रचलित थे। यदि कोल, भील और द्राविड़ आदि जातियों को इतिहासकार वैदिक काल से भी पूर्व का मानते हैं तो वे लोग अब भी अपनी भाषा और रीति के अनुसार उसी प्रकार कार्य करते हैं और कहना न होगा कि “सभ्य” कहे जाने वाली जातियों की तुलना में वे अधिक तात्कालिक सफलता प्राप्त करते हैं। कोई भी व्यक्ति अभी गौड़वाने के प्रान्त में जाकर इसका प्रत्यक्ष प्रमाण पा सकता है।
वेदों में अधिकतर मन्त्रों का ही बहुल्य है, परन्तु वे सभी मन्त्र आत्म-कल्याण, लोक और परलोक के हित की दृष्टि से रचे गए हैं। वे महान् हैं और परम तत्व (ईश्वर) के अनुरोधक हैं, यों कहिए कि उनमें इतनी शक्ति है जो अवश्य और अव्यय ब्रह्म को भी वशीभूत सा बना कर अपनी कामनाएँ पूर्ण करा सकती है। अतएव मन्त्र वह प्रभावशाली शब्द या शब्दसमूह कहा जा सकता है, जिसका नियमानुसार जाप करने से वांछित कार्य सफल हो जाता है।
यद्यपि सभी मन्त्र वैदिक नहीं हैं, कुछ वैदिक काल से बहुत पीछे भी बनाए गए हैं और उनमें “देवी, हनुमान, भैरव” आदि के प्रति प्रार्थना या अनुरोध किया गया है। परन्तु पाठकों या साधकों को यह कदापि न भूलना चाहिए कि ये समस्त देवी-देवता — चाहे देवी हों, चाहे असुरी — सभी सर्वशक्तिमान, सर्वगुणनिधान परब्रह्म की ही आंशिक शक्तियों के नाम हैं।
प्राणी मात्र का यह स्वाभाविक नियम है कि किसी काम के करने में वह जितनी अंग-शक्ति की आवश्यकता समझता है, उतने ही से काम लेता है। जैसे देखने के लिये केवल आँख खोलने की आवश्यकता है; यदि दृश्य आँख खोलने पर दिखाई न दे अर्थात् वह किसी ऐसी जगह हो जहाँ से दृष्टि न पहुँच सके, तो पैरों से भी काम लेना होगा। किसी-किसी काम में हाथ, पैर, आँख, कान आदि सभी इन्द्रियों का काम पड़ता है; किसी में केवल बुद्धि का और किसी में केवल आत्मा का। कहने का तात्पर्य यह है कि जैसा कार्य हो वैसी ही शक्ति का उपयोग किया जाता है। ये समस्त शक्तियाँ ईश्वर—पूर्ण ब्रह्म की हैं और पूर्ण की सम्पदा में उसके किसी अंश पर अधिकार पाना सहज साध्य है। अतएव मन्त्रों के आचार्यों ने ईश्वर की विभिन्न शक्तियों हेतु मन्त्र बनाए हैं। सम्पूर्ण ब्रह्म के नाम पर बनाए गए मन्त्रों द्वारा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को जीत कर उसी की प्राप्ति की जा सकती है; तदर्थ इन्हें छोटे-मोटे कार्यों के लिये प्रयुक्त करना आवश्यक नहीं समझा जाता।
किसी प्रयोग या क्रिया का जो नियम निर्धारित किया गया है, उसे तन्त्र कहते हैं। जिस यन्त्र द्वारा अभिष्ट कार्य की सिद्धि होती है, उसे तान्त्रिक यन्त्र समझना चाहिए। यन्त्र, तन्त्र और मन्त्र का ऐसा घनिष्ठ सम्बन्ध है, जैसा किसी मशीन के चलाने में धातु, ज्ञान और कर्म-कौशल का। तीनों के बिना जैसे मशीन नहीं चल सकती, वैसे ही इन तीनों के बिना अभिष्ट कार्य सिद्ध होना संभव नहीं है।
मन्त्रों का अर्थ और उनकी शक्ति
“ॐ नमो नारायणाय सर्व लोकान मम वशं कुरु कुरु स्वाहा” — यह एक सब लोगों को वश में करने का मन्त्र है। इसका अर्थ है—मैं नारायण को नमस्कार करता हूँ; हे नारायण, सब लोकों को मेरे वश में कर दें। इस उदाहरण से मेरा तात्पर्य यह है कि प्रायः सभी मन्त्र किसी देवता विशेष की प्रार्थना रूपी वाणी होते हैं, जिनका अर्थ भी प्रायः वही निकलता है जो साधक की कामना से सम्बन्ध रखता है।
शंका—यदि मन्त्र का अर्थ साधक की भावना का प्रार्थना रूप में प्रकट करना है, तो क्या कोई साधक अपनी भाषा के सीधे-सादे शब्दों में उसे प्रकट नहीं कर सकता? और क्यों उससे कार्य की सिद्धि नहीं हो सकती?
समाधान—अवश्य यदि कोई मनुष्य शब्दों का सून्य और प्रभाव जानता है, तो उसके द्वारा की गई प्रार्थना से भी कार्य सिद्ध हो सकता है और होता भी है। गोस्वामी तुलसीदास जी रचित हनुमानाष्टक और हनुमान चालीसा भी तो सरल हिन्दी में ही हैं; परन्तु मन्त्र-रूपकता का प्रभाव उनमें भी दिखता है। श्रीरामचरितमानस में स्थान-स्थान पर ऐसी चौपाइयां हैं जिनमें मन्त्रों का प्रभाव निहित है, जैसे—
“जाके सुमिरन ते रिपु नासा, तकर नाम शत्रुहन वेद प्रकाश।”
ये श्लोक तत्काल ही जादू जैसा काम करते हैं—बशर्ते साधक में सात्विक प्रकृति और राम-भक्ति हो।
शंका—फिर क्या आवश्यकता है कि पुराने गढ़े हुए मन्त्रों को ही अधिक सन्मान दिया जाए?
समाधान—मान लीजिए कि आप वैद्यक सीखना चाहते हैं और अभी उस विषय में कोई अनुभव नहीं रखते। तब आप ही बताइए कि प्रत्येक औषधि के गुण, प्रभाव तथा उनके मिश्रण के नियम निकालने में कितने युग व्यतीत होंगे, या आप किसी आचार्य के बनाए हुए ग्रन्थ की सहायता लेकर कुछ ही दिनों में सुयोग्य वैद्य बनना पसंद करेंगे? मेरी समझ में आपको दूसरी रीति अधिक उचित लगेगी। इसमें समय भी कम लगेगा और अनुभव प्राप्त करने में किसी प्रकार की हानि की सम्भावना भी नहीं रहेगी। इसी प्रकार ‘मन्त्र विद्या’ में जो साधन प्राचीन आचार्यों ने सुनिश्चित करके अद्भुत रूप में प्रस्तुत किए हैं, उनके अनुसार कार्य करने से हमें सहज ही सफलता मिल सकती है।
शंका—परन्तु प्रार्थना तो हृदय से होनी चाहिए, चाहे जैसे शब्दों में क्यों न हो; सफलता अवश्य देगी।
समाधान—यदि वह निष्काम भाव से केवल भक्ति या मोक्ष के लिए की जाय, तो अवश्य सफलता मिल सकती है। परन्तु सकाम भावना से, अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु की गई प्रार्थना प्रार्थना नहीं रहती; वह एक प्रकार का दबाव बन जाती है—किसी को वश में करके अपनी इच्छा के अनुरूप काम कराना। इसी कारण ऐसी प्रार्थनाओं को मन्त्र कहा गया है। अब आप ही विचार करें कि अगर हम किसी से जबरन काम लेने की कोशिश करें तो क्या वह सहज ही बंधन स्वीकार करेगी? कभी नहीं। आपकी जहाँ-जहाँ भी कोई कमी होगी, वह हाथ से निकल जाएगा और सम्भव है कि आपको भी कोई हानि पहुँचे।
शंका—मगर कभी-कभी इन मन्त्रों से भी सफलता नहीं मिलती।
समाधान—इसमें मन्त्रों का दोष नहीं है। मन्त्र-संबंधी साधन-क्रिया में किसी प्रकार की भूल या कमी हो जाने के कारण ही मन्त्रों में सिद्धि दिखाई नहीं पड़ती।
प्रश्न—साधन-क्रिया से क्या तात्पर्य है?
उत्तर—साधक को प्रत्येक प्रकार के साधनकाल में ब्रह्मचर्य, सत्य, त्याग, भक्ति, ध्यान, यम और नियम का पालन करना अनिवार्य है; साथ ही उन सम्पूर्ण नियमों का भी अक्षरशः पालन अनिवार्य है जो उस मन्त्र के साथ दिए गए हों।
प्रश्न—मान लीजिए कि यह सारी साधनाएँ करके सफलता मिल सकती है, तो इसमें क्या कोई विज्ञान का सिद्धांत घटित होता है?
उत्तर—किसी मन्त्र को बार-बार दुहराने का आशय यह है कि अपनी भावना एवं शक्ति में ऐसा आकर्षण उत्पन्न कर दिया जाए जो अभिष्ट के भाव-स्थल (हृदय) पर अपना प्रभाव डाल सके। जैसे विद्युत्-शक्ति का प्रभाव दूसरी विद्युत्-शक्ति पर पड़ता है, वैसे ही आत्म-शक्ति दूसरी आत्मा पर अपना प्रभाव डाल कर उसे तदात्म्य बना लेती है, क्योंकि समस्त आत्माएँ एक ही तत्व की हैं। आवश्यकता है कि उनमें सादृश्य तथा आकर्षण उत्पन्न किया जाय, जिससे वे चुंबक और लोहे की तरह एक-दूसरे की ओर खिंच सकें। इसी तदात्म्यता प्राप्त करने के लिए कोई अनुष्ठान करता है, कोई जप द्वारा उसे पुकारता है, और कोई अन्य प्रयोगों द्वारा उसे प्राप्त करता है।
यह विषय केवल हिन्दुओं के यहाँ ही मान्य नहीं है; प्रत्येक धर्म और प्रत्येक भाषा के लोग अपने-अपने नियमानुसार प्रयोग करते हैं। मुसलमान वज़ीफा करते हैं और उसी के बल पर गँठ बाँधते हैं। इस्लामी रीति-रिवाजों में भी इसी प्रकार के प्रयोग मिलते हैं।
शंका—मगर आजकल इन विषयों में सफलता बहुत ही कम क्यों देखी जाती है?
समाधान—इसका कारण है वर्तमान समाज के दूषित भाव: स्वार्थ, भ्रम, प्रलोभन, आतुरता और नियमों का पूर्णतया पालन न करना, जिसके कारण कार्य सिद्धि की सफलता तो दूर, उल्टी हानि भी उठानी पड़ती है। गलत तरीके से साँप पकड़ने में सम्भव है कि वह फन भी मार दे।
