| Author | S. W. Failan |
| Genre | Self-Help |
| Language | Hindi |
| Pages | 382 |
| File Size | 94 |
Book Summary
“हिन्दुस्तानी कहावत कोश” एक महत्वपूर्ण संग्रह है जो भारतीय भाषाओं के प्रचलित और प्राचीन कहावतों को एकत्रित करता है। यह पुस्तक हिंदी भाषा और संस्कृति के अनेक पहलुओं को सरल और समझने योग्य रूप में प्रस्तुत करती है।
यह कोश न केवल कहावतों का संग्रह है, बल्कि उनके पीछे की विरासत, अर्थ और सामाजिक महत्व को भी उजागर करता है। यह छात्रों, शिक्षकों, लेखकों और हिंदी साहित्य के प्रेमियों के लिए एक अनमोल संसाधन है जो भाषा की गहराई और सांस्कृतिक परंपराओं को समझना चाहते हैं।
पुस्तक का स्वरूप ऐसा है कि यह सभी आयु वर्ग के पाठकों के लिए आकर्षक एवं उपयोगी सिद्ध होती है, साथ ही यह भाषा सीखने वालों के लिए भी बेहद सहायक है। इसका उद्देश्य हिंदी कहावतों को सरल भाषा में समझाना और उनकी सांस्कृतिक महत्ता को जन-जन तक पहुंचाना है।
Additional Information
व्यवहृत सांकेतिक अक्षरों के निर्देश
अं. = अंग्रेजी
अ. = अरबी
उप. = उपदेश
ऊ. दे. = ऊपर देखिए
क. = कहते हैं अथवा कही जाती है
कहा. = कहावत
क्र. = कृषि संबंधी
गा. = ग्रामीण
दे. = देखिए
नी. वा. = नीति-मूलक वाक्य
पं. = पंजाबी
पाटा. = पाठांतर
प्र. पा. = प्रचलित पाठ
पू. = पूर्वी
फ्रा. = फ़ारसी
मो. = भोजपुरी
म. = मराठी
मु. = मुसलमानों में
मुहा. = मुहावरा
रा. मा. = रामचरितमानस
लो. वि. = लोक-विश्वास
व्य. = व्यवसाय संबंधी
सं. = संस्कृत
समा. = समानता
स्त्रि. = स्त्रियों में प्रचलित
हिं. = हिंदुओं की
सूचना
कहावतों की व्याख्या में अधिकांश स्थलों पर “तव,” “इसलिए” आदि के आगे (.) चिह्न लगाकर छोड़ दिया गया है।
वहाँ प्रसंग के अनुसार वाक्य को इस प्रकार पूरा कर लेना चाहिए —
“तव कहते हैं,” “इसलिए कहते हैं,” अथवा “इसलिए कहा गया है।”
आ
आंख एकौ नहीं कजरौटी दस ठाई
आंख एक भी नहीं, और कजरौटी रख छोड़ी हैं दस। झूठा आडंबर दिखाना।
कजरीटा — काजल रखने की डिबिया।
ठाई — ठौर, स्थान, संख्यावाची शब्द।
तुलना — आंख नहीं पर काजर पारे।
आंख ओझल पहाड़ ओझल
आंख की ओट होने से तो पहाड़ भी नहीं दिखाई देता।
किसी को तभी तक हमारा ध्यान रहता है जब तक वह हमारी नजर के सामने हो।
(एक रूप — सींक ओट हुए, पहाड़ ओट हुए। मराठी में — काडी आड गेला तो पर्वता आड गेला।)
आंख का अंधा, गांठ का पूरा
ऐसा धनी पर मूर्ख व्यक्ति, जिसका पैसा आसानी से उड़ाया जा सके।
आंख का पानी ढल गया
लाज-शर्म खो बैठना।
आंख की बदी भौंह के सामने
बुरी नीयत छिपती नहीं, चेहरे पर प्रकट हो जाती है।
आंख के आगे नाक, सूझे क्या खाक
(व्यंग्य में) आंख पर तो परदा पड़ा है, दिखाई क्या दे?
(कहानी: एक नकटे ने कहा कि उसे ईश्वर के दर्शन होते हैं। जब लोग बोले — “हमारी भी आंखें हैं, हमें क्यों नहीं?” तो उसने कहा — “तुम्हारी आंख के आगे नाक है।” लोग अपनी नाक कटवाने लगे, पर दर्शन न हुए। तब सबने वही बात दोहरानी शुरू कर दी — “नाक की वजह से हमें ईश्वर नहीं दिखाई देता।” और नकटों की जमात बढ़ने लगी।)
आंख गह, नाक भद्द, सोहनी नाम
नाम अच्छा, पर रूप-रंग विपरीत।
आंख चौपट, अंधेरे नफ़रत
आंख है ही नहीं, और कहते हैं — “अंधेरे से नफ़रत है।” झूठी शान दिखाना।
आंख न दीदा, काढ़े कशीदा
काम करने का शऊर नहीं, फिर भी करने का शौक। (कशीदा — कपड़े पर वेल-बूटे काढ़ना।)
आंख न नाक, बन्नी चांद-सी
शक्ल-सूरत भद्दी, पर सजने-संवरने का शौक।
आंख फड़के दहिनी, मैया मिले कि बहिनी
आंख फड़के बाई, भैया मिलें कि साई
(लोकविश्वास — दाहिनी आंख फड़के तो मां या बहन से, बाईं फड़के तो भाई या पति से भेंट होती है।)
आंख फूटी पीर गई
(वेदना से) आंख फूटी तो फूटी, पर कष्ट से छुटकारा मिला। अच्छी वस्तु यदि कष्टदायक हो तो उसका जाना अच्छा।
आंख फूटेगी तो क्या भौंह से देखेंगे
मुख्य वस्तु न रहे तो कार्य कैसे होगा? प्रायः ऐसी स्त्री के लिए कहा जाता है जो अपने पति का अनादर करती है।
आंख फेरे तोते की-सी, बात करे मैना की-सी
बात करने में मीठा, पर बेमुरौवत।
आंख बधी माल दोस्तों का
जहां चोरी या नुकसान का डर हो, वहां चेतावनी के रूप में कहा जाता है — “अपनी चीज संभालो, वरना माल गायब हो जाएगा।”
(कहावत: “आंख बची और नगरी लुटी।”)
आंख में मैल और इसमें मेल नहीं
बहुत स्वच्छ वस्तु या सच्चरित्र व्यक्ति।
आंख में लोर, दांत निपोर
सिलबिला आदमी।
आंख है जब तक तो खुश आती है भौंह, आंख फूटी तो कब भाती है भौंह
जब तक प्रिय व्यक्ति है, उसके संबंधी अच्छे लगते हैं। उसके जाने पर उनसे लगाव नहीं रहता।
आंखें तो खुली रह गई और मर गई बकरी
अप्रत्याशित घटना घट जाना। (बकरे की गर्दन कटने पर आंखें खुली रहती हैं।)
आंखें हुई चार तो मन में आया प्यार
आंखें हुई ओट तो जी में आया घोट — मुंह देखे की प्रीति।
आंखें हैं या भैंस के चूतड़
जिसे सामने की चीज न दिखाई दे — उससे हंसी में कहा जाता है।
आंखों का देखा दूर कर, भले मानस का कहना कर
दुराग्रह छोड़कर भले आदमी की सलाह माननी चाहिए।
आंखों का नूर, दिल की ठंडक
प्रियजन के लिए कहा जाता है।
आंखों का काजल चुराता है
चालाक या धूर्त व्यक्ति।
आंखों का तारा
बहुत प्यारा व्यक्ति, प्रायः पुत्र के लिए।
आंखों का तेल निकालना
बहुत मेहनत या कंजूसी करना। (मुख्यतः चालाकी के संदर्भ में प्रयुक्त।)
आंखों की सूइयां निकालना बाकी है
(कहानी: किसी ने शत्रु की आटे की मूर्ति बनाकर सूइयां चुभोईं। उसकी स्त्री ने सूइयां निकालकर उसे जीवित किया। पर आंखों की सूइयां नौकरानी ने निकाल दीं, और वह जीवित होकर उसी से विवाह कर बैठा।)
आंखों के अंधे नाम नैनसुख
नाम के विपरीत गुण। (तुलना: आंखों के अंधे नाम रोशन।)
आंखों देखा भट पड़े, मैंने कानों सुना था
आंखों देखी बातों पर भी विश्वास न करने वाले से व्यंग्य में कहा जाता है। (भट पड़े — भाड़ में जाए।)
आंखों देखी मानूं, कानों सुनी न मानूं
देखी बात पर विश्वास, सुनी बात पर नहीं।
आंखों पर ठीकरी रखना
जानबूझकर अनजान बनना।
आंखों पर पलकों का बोझ नहीं होता
(1) अपने घर का आदमी भारी नहीं लगता।
(2) बड़ों को छोटों का पालन-पोषण अखरता नहीं।
आंखों में बाक
गाली देना, कोसना, धोखा देना।
आंखों में घर करता है
बहुत प्रिय लगना।
आंखों में वर्ची छाई है
अपने दोष न देख सकने वाला या अत्यधिक घमंडी व्यक्ति।
आंखों में सरसों फूलना
मदमस्त होना, किसी को कुछ न समझना।
आंखों बालों ओखयां बड़ी न्यामत हैं
अंधे भिखारियों की टेर।
आंखों सुख, कलेजे ठंडक
बहुत प्रिय वस्तु, पुत्र आदि के लिए कहा जाता है।
आंखों से सुखी नाम हाफ़िज जी
भगवान ने आंखें दीं, फिर भी नाम “हाफ़िज” — गलत नाम। (मुसलमानों में अंधे को सम्मानपूर्वक “हाफ़िज” कहते हैं।)
आंत भारी तो माथ भारी
पेट खराब हो तो सिर भी भारी रहता है।
आंता-तीता, दांता नोन, पेट भरन को तीन ही कोन
सादा और सीमित भोजन के गुण बताने वाला लोकवाक्य।
आंखें पानी, काने तेल, कहे पाप बैठाई गेल
ताजा खाना, दांतों में नमक लगाना, पेट का कुछ हिस्सा खाली रखना, आंखों में ठंडा पानी डालना और कानों में तेल डालना — इससे वैद्य की जरूरत नहीं रहती।
आंपर कूकर बतास फूंके
(अंधा कुत्ता हवा की आहट से भौंकता है — अज्ञान में शोर मचाना।)
आंधर कूटे, बहिर कूटे, चावल से काम
आदमी कैसा भी हो, काम हो जाना चाहिए।
आंधर के गाय बयाइल, टहरी लेके दौरलन
अंधे की गाय ने वच्छा दिया, तो लोग मटकी लेकर दौड़े — सीधे व्यक्ति की सादगी से सब लाभ उठाते हैं।
आंधी आवे बैठ जाए, पानी आवै भाग जाए
आंधी में दौड़ना नहीं चाहिए, पानी में ठहरना नहीं चाहिए।
आंधी के आगे बेने की बतास
आंधी में पंखा झलना व्यर्थ — व्यर्थ प्रयत्न।
(तुलना: भूतों के आगे तोट।)
आंधी के आम
अकस्मात हाथ लगी या सस्ती वस्तु।
आंसू एक नहीं, कलेजा टूक-टूक
झूठी सहानुभूति दिखाना।
आई गई पार पड़ी
जो होना था हो चुका, अब चिंता व्यर्थ।
आई तो रमाई, नहीं तो फ़कत चारपाई
मजा मिला तो ठीक, नहीं तो कोई ग़म नहीं।
आई तो रोजी, नहीं तो रोज़ा
मिला तो खा लिया, नहीं तो उपवास समझो — फक्कड़ प्रवृत्ति।
आई न गई, कौन नाते बहिन
जबर्दस्ती रिश्ता निकालना।
आई न गई, कौले लग ग्याभिन भई
जब कोई निर्दोष होने का ढोंग करे।
आई न गई, छो-छो पर ही में रही
जो कभी घर से बाहर न निकली हो, ऐसी स्त्री के प्रति उपेक्षा।
आई बहू आया काम, गई बहू गया काम
(1) घर में जितने लोग बढ़ते हैं, काम भी बढ़ता है।
(2) बहू आई नहीं कि काम बढ़ गया, क्योंकि सारा काम उसी के जिम्मे।
