| Author | Hazari Prasad Dwivedi |
| Genre | Literature |
| Language | Hindi |
| Pages | 303 |
| File Size | 10 |
Book Summary
“अवधी लोक-गीत” एक अनूठा साहित्यिक संग्रह है जो अवध क्षेत्र की पारंपरिक और सांस्कृतिक लोकधुनों एवं गीतों को समेटे हुए है। इस पुस्तक में स्थानीय जीवन की भावना, भावनाओं और सांस्कृतिक धरोहर का सुंदर प्रदर्शन मिलता है, जो भारतीय लोकसंस्कृति को बेहतर समझने में मदद करता है।
यह संग्रह हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे विद्वान द्वारा संपादित और प्रस्तुत किया गया है, जो इसकी आत्मा और महत्व को गहराई से जानने वाले हैं। यह पुस्तक न केवल साहित्य प्रेमियों के लिए, बल्कि लोगों के लिए भी उपयोगी है जो लोकसंगीत के माध्यम से अपनी जड़ों से जुड़ना चाहते हैं।
पुस्तक का उद्देश्य अवध की लोकपरंपराओं को संरक्षित करना और उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना है। सहज भाषा और पाठकों को आकर्षित करने वाले रूप में लिखी गई यह पुस्तक हिंदी साहित्य और सांस्कृतिक अध्ययन के लिए एक अमूल्य साधन है।
Additional Information
डा० कृष्णदेव उपाध्याय जी ने लोकगीतों का बहुत विस्तृत और गम्भीर अध्ययन किया है। उन्होंने अपना जीवन ही लोकवार्ता (संस्कृति) के अध्ययन को समर्पित कर दिया है। इस दिशा में उनके कार्यों की सराहना देश में ही नहीं, विदेश में भी हुई है। उनका प्रमुख कार्यक्षेत्र भोजपुरी लोकगीत और लोकवार्ता का साहित्य रहा है। इस बार उन्होंने अवधी लोकगीतों के विशाल भण्डार से मानक और सरस गीतों के संग्रह में मन लगाया है। परिणामस्वरूप यह पुस्तक प्रस्तुत है।
अवधी के लोकगीतों का भण्डार अत्यन्त विशाल है। इस दिशा में कुछ कार्य हुआ भी है। सर्वप्रथम स्वर्गीय पं० रामनरेश त्रिपाठी ने बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया। अनेक विद्वानों ने अवध प्रदेश में प्रचलित लोकगीतों का संग्रह, विश्लेषण और मूल्यांकन किया है। परन्तु अभी भी इस विशाल भण्डार का केवल अंश ही प्रकाशित हो पाया है।
उपाध्याय जी ने जिन लोकगीतों को चुना है, उनमें ग्रामीण जनता की आशा-आकांक्षा, प्रेम-विरह, हास-परिहास और उत्सव-आनन्द का जीवन्त रूप प्रकट हुआ है। ये गीत सही अर्थों में जनजीवन के वास्तविक स्वरूप को अभिव्यक्त करते हैं। सहज जनभाषा में गीतों के रचनाकारों ने अपना हृदय निचोड़कर रख दिया है। इनमें रसाभिव्यंजना का कोई परिपाटी-विहित आडंबर नहीं है, फिर भी ये रस की अभिव्यक्ति में पूर्ण समर्थ हैं और सहृदयों को भावविभोर कर देते हैं।
डा० कृष्णदेव उपाध्याय ने इन लोकगीतों को एक स्थान पर प्रकाशित करके साहित्य-रसिकों के लिए अत्यन्त सरस उपहार प्रस्तुत किया है। उनका यह प्रयत्न निश्चय ही प्रशंसनीय है। मैं इस सुन्दर संग्रह का हार्दिक स्वागत करता हूँ और मुझे आशा है कि लोकसाहित्य के प्रेमीजन भी इसका स्वागत करेंगे।
डा० उपाध्याय वृद्ध तो नहीं कहे जा सकते, परन्तु युवावस्था से आगे भी नहीं हैं। इस अवस्था में लोग प्रायः विश्राम की बात सोचते हैं, पर वे निरन्तर परिश्रम करते रहते हैं और अपने प्रिय विषय—लोकसाहित्य—के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखते हैं।
लोकसाहित्य के प्रति मेरा आकर्षण किस प्रकार हुआ, इसकी चर्चा मैंने संक्षेप में ‘भोजपुरी लोकगीत भाग २’ की भूमिका में की है। अपने साहित्यिक जीवन के प्रारम्भ में मुझे लोकगीतों के संग्रह के लिए इस कंचन काया को जेठ की भीषण लू में जलाना पड़ेगा, कीचड़ और कर्दम से भरी गाँव की पगडण्डी पर भादों की अँधेरी रात में चलना पड़ेगा — इसकी कल्पना भी नहीं की थी। परन्तु जब एक बार, अनायास ही सही, लोकसाहित्य से नाता जुड़ गया तो उसे तोड़ना ठीक नहीं समझा। जिस प्रकार एक सती एवं आदर्श हिन्दू नारी एक व्यक्ति से प्रेम कर जीवन भर उस प्रेम का निर्वाह करती है, उसी प्रकार लोकसाहित्य से परिचय प्राप्त कर उसके आनन्द का आस्वादन करने के पश्चात् मैंने भी अपने जीवन को इसी की सेवा में अर्पित करने का व्रत लिया। कालान्तर में यह प्रेम बढ़ता गया और मेरे जीवन का बल तथा सम्बल बन गया। आज तो यही मेरा जीवनाधार है।
लोकसाहित्य का एक विनम्र शोधकर्ता होने के अतिरिक्त मैं अपने को लोकसंस्कृति और लोकसाहित्य का एक मिशनरी भी मानता हूँ। जिस प्रकार धर्मप्रचारक के लिए अपने धर्म का प्रचार करना परम पुनीत एवं आवश्यक कर्म है, उसी प्रकार लोकसंस्कृति और साहित्य का संग्रह, सम्पादन एवं प्रकाशन कर उसका प्रसार, प्रचार और रक्षा करना मैं अपना परम पवित्र कर्तव्य ही नहीं, धर्म भी मानता हूँ। इसलिए इस महान देश के किसी भी प्रदेश के लोकसाहित्य का प्रकाशन मेरे लिए आनन्द और उत्सव का अवसर होता है।
उत्तर प्रदेश सरकार के शिक्षा विभाग में कार्य करते हुए मुझे इस प्रदेश के विभिन्न भागों में रहने का अवसर प्राप्त हुआ। कभी ब्रज प्रदेश में, कभी अवधी क्षेत्र में; कभी कुमायूँ और गढ़वाल के पर्वतीय अंचलों में, तो कभी बुन्देलखण्ड के मैदानों में। अनेक वर्षों तक इस प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भी निवास का सुयोग मिला। इस सरकारी नौकरी के स्थानान्तरणों से जहाँ अनेक कष्टों का अनुभव हुआ, वहीं कुछ लाभ भी मिले — सबसे बड़ा लाभ था स्थानीय लोकसाहित्य और संस्कृति से परिचय। नौकरी के सिलसिले में प्रदेश के जिस भाग में भी मुझे रहना पड़ा, वहीं मेरा एक ही उद्देश्य रहा — स्थानीय लोकसाहित्य का संकलन। इस कार्य को मैं स्वयं भी करता था और अपने विद्यार्थियों को भी इसके लिए प्रेरित तथा प्रोत्साहित करता रहता था।
सन् 1950–60 की बात है। मैं वन विहार (गवर्नमेंट ट्रेनिंग कॉलेज) में हिन्दी का प्राध्यापक था। मैंने अपने छात्राध्यापकों के समक्ष अवधी लोकसाहित्य के महत्व का प्रतिपादन करते हुए इसके संग्रह की आवश्यकता पर बल दिया। मैं जानता था कि इस कार्य को सभी छात्र नहीं कर पाएँगे, परन्तु यह विश्वास अवश्य था कि यदि इन विद्यार्थियों में से किसी एक के हृदय में भी अवधी लोकगीतों के प्रति अनुराग उत्पन्न हो गया, तो मेरा प्रयोजन सफल हो जाएगा। जायसी के शब्दों में कहना चाहूँगा —
“दूर मिहान निधि जी मेला, जो सुनुवाइ नेह मो नेता।”
अर्थात् वास्तविक शिष्य वह है जो गुरु द्वारा प्रदत्त चिनगारी को अपने हृदय में जलाकर आलोकित कर दे।
मुझे भी ऐसे ही एक योग्य शिष्य श्री सत्यनारायण मिश्र, एम० ए० के रूप में प्राप्त हुए, जिनके हृदय पर मेरे उपदेश का गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने मेरे निर्देश से सुल्तानपुर, प्रतापगढ़ आदि जिलों के गाँवों में घूम-घूमकर अवधी लोकगीतों का बड़े प्रेम और परिश्रम से संग्रह किया। इस प्रकार इस संकलन का अधिकांश श्रेय उन्हें प्राप्त है। सत्य तो यह है कि यदि मिश्र जी का सतत सक्रिय सहयोग प्राप्त न होता, तो सम्भवतः इस पुस्तक का प्रकाशन भी कठिन था।
अवधी प्रदेश में सोनायिका जैसा भावपरक वातावरण सदा व्याप्त रहा है। यह आवश्यक है कि विद्वान इस विशाल लोकसाहित्य की राशि का संग्रह एवं सम्पादन करें। प्रस्तुत पुस्तक में संस्कारगीतों, ऋतुगीतों, जातिगत गीतों, बालगीतों तथा धार्मिक गीतों (भजन आदि) का संकलन किया गया है। विभिन्न संस्कारों और ऋतुओं में गाए जाने वाले गीतों का संक्षिप्त विवरण “प्रस्तावना” भाग में दिया गया है। प्रत्येक गीत किस अवसर पर, किस व्यक्ति द्वारा और किस भाव में गाया जाता है, इसका उल्लेख सन्दर्भ में किया गया है।
अवधी गीतों के अर्थ को अन्य क्षेत्र के पाठक भी भलीभाँति समझ सकें, इसके लिए प्रत्येक गीत का अर्थ सरल हिन्दी में प्रस्तुत किया गया है। कठिन अवधी शब्दों के अभिप्राय को स्पष्ट करने के लिए उनके अर्थ फुटनोट (पादटिप्पणी) में दिए गए हैं। इस प्रकार प्रत्येक गीत के सम्पादन में क्रमशः — उसका क्षेत्रीय सन्दर्भ, मूल पाठ (टेक्स्ट), हिन्दी अनुवाद तथा कठिन शब्दों का अर्थ देकर इसे सुन्दर रूप देने का प्रयास किया गया है।
‘भोजपुरी लोकगीत भाग १ एवं २’ के सम्पादन में जिस वैज्ञानिक पद्धति का अनुसरण किया गया था, उसी के अनुसार प्रस्तुत संकलन को भी तैयार किया गया है।
भोजपुरी लोकगीतों के दो भागों के प्रकाशन के पश्चात् ‘अवधी लोकगीतों’ का यह संग्रह पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते हुए मुझे अत्यन्त प्रसन्नता हो रही है। यदि हिन्दी-जगत् के लोकसाहित्य-प्रेमियों ने इस ग्रन्थ का स्वागत किया, तो सम्भव है कि निकट भविष्य में हिमालय के गीतों का संकलन भी प्रस्तुत किया जा सके। भविष्य में अवधी की पहेलियों और लोकोक्तियों का संग्रह भी प्रकाशित करने की मेरी योजना है, जो हजारों की संख्या में मेरे पास संग्रहीत हैं।
जिन लोगों ने इस पुस्तक के निर्माण में सहायता प्रदान की है, उनके प्रति मैं हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने इस ग्रन्थ की भूमिका लिखने की कृपा की है, इसके लिए मैं उनका अत्यन्त आभारी हूँ। मेरे सुयोग्य शिष्य श्री सत्यनारायण मिश्र, एम० ए० ने अवध प्रदेश में घूम-घूमकर इन गीतों का बड़े परिश्रम से संग्रह किया है, अतः वे मेरे हार्दिक आशीर्वाद के पात्र हैं।
मेरी सुपुत्री कु० वीना कुमारी उपाध्याय, एम० ए०, पी०ए०बी० ने पुस्तक की पाण्डुलिपि तैयार करने में मेरी बहुत सहायता की। मेरे कनिष्ठ पुत्र रविशंकर उपाध्याय, एम० ए० ने विविध प्रकार की सहायता कर मेरे कार्य को सरल बना दिया। अतः मैं इन दोनों को अपना आशीर्वाद देता हूँ तथा उनके उज्ज्वल, मंगलमय भविष्य की कामना करता हूँ। धर्मपत्नी श्रीमती राजेश्वरी देवी ने गीतों के पाठ-निर्णय में सहयोग दिया है — उन्हें धन्यवाद देना मात्र औपचारिकता होगी।
