| Author | Bhrigu Raj |
| Genre | Astrology Books |
| Language | Hindi |
| Pages | 328 |
| File Size | 7 |
Book Summary
“सामुद्रिक शास्त्र” प्राचीन भारतीय ज्योतिष विज्ञान का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो व्यक्ति के शरीर और उसके अंगों के आधार पर उसके चरित्र, भाग्य और स्वास्थ्य की जानकारी देता है। यह पुस्तक ज्योतिषाचार्य भृगुराज द्वारा लिखित है, जो इस विषय के गहरे जानकार और विशेषज्ञ हैं।
इस पुस्तक में आपको “सामुद्रिक शास्त्र” के सिद्धांतों और तकनीकों को सरल और स्पष्ट रूप में समझाया गया है, ताकि इसे कोई भी आसानी से सीख सके और अपने जीवन में उपयोग कर सके। यह आपके व्यक्तित्व, जीवन के उतार-चढ़ाव और भविष्यवाणियों को समझने में एक मजबूत मार्गदर्शक साबित होती है।
यह पुस्तक न केवल ज्योतिष के शौकीनों के लिए, बल्कि सामान्य लोगों के लिए भी अत्यंत उपयोगी है जो अपने जीवन के विभिन्न पहलुओं को बेहतर समझना चाहते हैं। इसे पढ़कर आप न केवल ज्ञान प्राप्त करेंगे, बल्कि आत्मविश्वास और समझदारी की ओर भी कदम बढ़ा सकेंगे।
Additional Information
ज्योतिष के क्षेत्र में भारत संसार के समस्त देशों से सदा आगे रहा है। आज, यद्यपि अन्य क्षेत्रों में भारत की गणना संसार के पिछड़े देशों में होती है, किन्तु ज्योतिष के मामले में वह पिछले सैकड़ों वर्षों से संसार के समस्त देशों का नेतृत्व करता चला आ रहा है। यह नगण्य सत्य है कि संसार के समस्त देशों का ज्योतिष ज्ञान भारत के ज्योतिष ज्ञान के सम्मुख कोई अस्तित्व नहीं रखता।
इसके साथ ही यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे देश में इस विद्या की धीरे-धीरे अवनति हो रही है।
अवनति के दो मूल कारण हैं —
पहला कारण यह है कि देश में ऐसा कोई विद्यालय नहीं जहाँ इसकी दीक्षा का समुचित प्रबंध हो। किसी भी विद्या का उत्थान तब तक संभव नहीं जब तक शासन उसके प्रसार और खोज का पूर्ण साधन उपलब्ध नहीं कराता। देश के पाठ्यक्रम में इसका कोई महत्व नहीं, अतः जिज्ञासु व्यक्ति भी इसके ज्ञान प्राप्ति के साधनों से वंचित रह जाते हैं। उनका ज्ञान अधूरा रह जाता है और शृंखलाबद्ध न होने के कारण उसका कोई महत्व नहीं रहता। शासन की उपेक्षा जो सदियों से इस विद्या के साथ चली आ रही है, इसके पतन का मुख्य कारण बन गई है।
दूसरा कारण जनता की इस विद्या के प्रति उपेक्षा है। साधारण जन-समुदाय इसे केवल जन्मपत्री बनाने वाले पंडितों तथा शनिवार के दिन तेल माँगने वाले भिखारियों की विद्या ही समझता है। यह सच भी है कि इन दोनों श्रेणियों के लोगों ने अपने अधूरे ज्ञान द्वारा जनता का बहुत अहित किया है। लोगों का इस पर विश्वास उठ गया है।
फिर भी कई लोग इसे प्राचीन विद्या मानकर इसका आदर तो करते हैं और सच्चे ज्ञाता की खोज में रहते हैं कि जिससे उनका साक्षात्कार हो सके। भूत और भविष्य की गणना करके फलादेश कहना विशेष महत्व रखता है।
भारत आज प्रगति के पथ पर अग्रसर है, अतः यह हमारा कर्तव्य है कि हम इस क्षेत्र में भी उचित सुधार करें। इस विद्या का प्रसार उचित रीति से होना चाहिए। इसका उत्तरदायित्व हमारा है कि हम इस विद्या को शृंखलाबद्ध करके, उचित तर्कों के साथ जनता के सम्मुख प्रस्तुत करें।
ज्योतिष बहुत गहन विषय है। इसका क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है और इसे एक साथ समेटना असंभव है। अतः इसके विभिन्न अंगों को अलग-अलग करके ही समझा जा सकता है। प्रस्तुत पुस्तक में हमने रेखा विज्ञान का विवेचन किया है।
मनुष्य के शरीर में तीन अंग ऐसे हैं जहाँ रेखाओं का बाहुल्य होता है — हाथ, पैर, और मस्तिष्क। यह तीनों अंग शरीर के प्रवर्तक हैं। परिवर्तन जीवन के हर क्षेत्र में अवश्यम्भावी है, अतः इन परिवर्तनों का प्रभाव मस्तिष्क, हाथ और पैर पर अवश्य पड़ता है।
प्राचीन अन्वेषकों ने सिद्ध किया है कि अंगों की रेखाएँ मनुष्य के जीवन के परिवर्तनों के साथ घटती-बढ़ती रहती हैं। इसी सिद्धांत को आधार बनाकर ज्योतिषाचार्यों ने इस विद्या की नींव रखी।
जिस प्रकार औषधि-विज्ञान के प्रवर्तकों ने विविध औषधियों का स्वयं सेवन कर उनके गुण-दोषों का परीक्षण किया, उसी प्रकार इस विज्ञान के अन्वेषकों ने भी रेखाओं के बदलने पर शोध किया। उनका मत है कि मनुष्य के कर्मों तथा जीवन के परिवर्तनों का प्रभाव रेखाओं पर अवश्य पड़ता है।
इस विद्या के जानकारों ने केवल रेखाओं को देखकर ही मनुष्य के भूत और भविष्य का ऐसा सटीक वर्णन किया है कि संसार आश्चर्यचकित रह गया।
मानव समाज के जन्म के साथ ही इस विद्या का जन्म हुआ। ऐतिहासिक तथ्यों से सिद्ध है कि भारतीय सभ्यता अत्यंत प्राचीन है। भारत की अन्य विद्याओं की तरह इस विद्या का भी विकास होता रहा। भारतीय ऋषियों और संतों ने सौर-मंडल की गति, मनुष्य के हाथ की रेखाएँ और अन्य संकेतों का अध्ययन किया। उनके अनुभवों और परीक्षणों का जो सार निकला, वही आज ज्योतिष विद्या के रूप में विद्यमान है।
सूर्य, पृथ्वी और चंद्र आदि ग्रह चलायमान हैं — इस तथ्य को हमारे पूर्वज बहुत पहले ही प्रमाणित कर चुके हैं। यह भी सत्य है कि प्रकृति का प्रत्येक कण चलायमान है। प्रगति के अनुसार ही हर वस्तु का फलादेश होता है, और इसी तत्व पर ज्योतिष की नींव रखी गई है।
प्रस्तुत पुस्तक में रेखा विज्ञान के हर पहलू पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है। कहीं-कहीं अंग्रेज़ी मतों का भी उल्लेख किया गया है, किंतु यह ध्यान रखना चाहिए कि पश्चिमी देशों में इस विद्या का मूल स्रोत भारत ही रहा है।
भारतीय सभ्यता जब उन्नति के शिखर पर थी, उस समय संसार के अधिकांश देश असभ्य थे। यदि किसी देश को भारत का समकालीन कहा जा सकता है, तो वे हैं चीन, यूनान और मिस्र। ब्रिटेन, जर्मनी, रूस आदि का विकास पाँच सौ वर्षों से अधिक पुराना नहीं है।
यूनान में ज्योतिष विद्या का प्रचार लगभग पाँच हजार वर्ष पहले था। कहा जाता है कि सिकंदर महान के साथ उसका निजी ज्योतिषी भी यात्रा करता था। चीन में भी यह विद्या ईसा से लगभग ढाई से तीन हजार वर्ष पहले से प्रचलित है।
यूरोप में ज्योतिष का प्रचार जिप्सी लोगों ने किया, जो भारत के बनजारों जैसे होते हैं। वे घूमते रहते थे और हाथ की रेखाएँ देखकर भविष्य बताकर जीविका चलाते थे। जिप्सियों के माध्यम से यह विद्या यूरोप में फैली।
सबसे पहले जर्मनी ने इसे अपनाया और इस विषय पर पुस्तकें प्रकाशित कीं। कहा जाता है कि हिटलर भी अपने साथ एक ज्योतिषी रखता था जो युद्ध की दिशा और रणनीति तय करने में उसकी सहायता करता था। धीरे-धीरे यह विद्या यूरोप के अन्य देशों में भी फैल गई।
इंग्लैंड ने प्रारंभ में इसका विरोध किया, पर भारत से संपर्क होने पर इसके महत्व को समझा। आज भी अंग्रेजी में लिखी गई कई पुस्तकें इसी विद्या पर आधारित हैं।
ज्योतिष ने यद्यपि अनेक बाधाएँ झेली हैं, फिर भी यह आज जीवित है और निरंतर उन्नति कर रही है, क्योंकि इसमें सत्य का तत्व है। प्रकृति में केवल वही ज्ञान स्थायी रहता है जिसमें सत्य होता है।
मनुष्य अपना भविष्य जानना चाहता है। यही एक विद्या है जो भविष्य की झलक दिखा सकती है। हमारे प्राचीन ज्योतिषाचार्य हजारों वर्षों के लिए भविष्यवाणियाँ लिखकर गए हैं — पंचांग इसका उदाहरण है। यही ज्योतिष की कृपा है कि ग्रहण आदि की तिथियाँ और समय पहले से ज्ञात हो जाते हैं।
ज्ञान की वृद्धि तभी संभव है जब विद्या को इस रूप में प्रस्तुत किया जाए कि जनसाधारण को भी उसका लाभ हो सके। इसी उद्देश्य से इस पुस्तक को प्रकाशित किया गया है।
इस विषय पर अन्य पुस्तकें अत्यंत जटिल हैं, इसलिए सामान्य व्यक्ति उनका लाभ नहीं उठा पाता। आशा है कि यह पुस्तक उस कमी को पूरा करेगी।
इसकी सहायता से सामान्य पाठक भी अपनी रेखाओं के माध्यम से अपने जीवन की दिशा का ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ हो सकेगा।
यह आवश्यक है कि इस विद्या के अध्ययन के लिए व्यक्ति में धैर्य हो, क्योंकि रेखाओं के बनने-बिगड़ने या बदलने में समय लगता है। अतः पाठकों से निवेदन है कि इस पुस्तक का अध्ययन ध्यानपूर्वक करें और किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले सभी तथ्यों पर विचार अवश्य करें।
भविष्य हर व्यक्ति जानना चाहता है। कहावत भी है —
“Prevention is better than cure”
(अर्थात् उपचार से बचाव श्रेष्ठ है)।
गलत भविष्यवाणी करने से बेहतर है भविष्य न बताना। अतः पुस्तक को ध्यान से पढ़ें, समझें और तभी निष्कर्ष निकालें।
आशा है विद्वान पाठक इस विद्या का अध्ययन सावधानी और गंभीरता से करेंगे।
