Kay Chikitsa (or Kayachikitsa): Vidyadhar Shukla | काय चिकित्सा : आचार्य विद्याधर शुक्ल

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Kay Chikitsa (or Kayachikitsa): Vidyadhar Shukla | काय चिकित्सा : आचार्य विद्याधर शुक्ल
AuthorVidyadhar Shukla
GenreAyurveda Books
LanguageHindi
Pages356
File Size14
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Book Summary

काय चिकित्सा : आचार्य विद्याधर शुक्ल

यह पुस्तक आयुर्वेद की प्रमुख शाखा कायचिकित्सा पर आधारित एक भरोसेमंद और गंभीर अध्ययन प्रस्तुत करती है, जिसमें शरीर से जुड़ी विभिन्न बीमारियों की पहचान, कारण, लक्षण और उपचार को सुव्यवस्थित तरीके से समझाया गया है। इसमें आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों के साथ-साथ व्यावहारिक चिकित्सा पद्धतियों को भी सरल, स्पष्ट और व्यवस्थित रूप में रखा गया है, ताकि विद्यार्थी और सामान्य पाठक दोनों इसे आसानी से समझ सकें।

आचार्य विद्याधर शुक्ल द्वारा रचित यह ग्रंथ आयुर्वेद के विद्यार्थियों, चिकित्सकों और आयुर्वेद में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है, क्योंकि इसमें शास्त्रीय ज्ञान को आधुनिक दृष्टिकोण के साथ जोड़ा गया है। पुस्तक में वर्णित उपचार-विधियाँ पारंपरिक आयुर्वेदिक ग्रंथों पर आधारित हैं, जो इसे एक प्रामाणिक और विश्वसनीय संदर्भ पुस्तक का रूप देती हैं।

कायचिकित्सा से जुड़ी जटिल अवधारणाओं को आसान भाषा, व्यवस्थित शीर्षकों और स्पष्ट व्याख्या के साथ समझाया गया है, जिससे यह पुस्तक परीक्षा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के साथ-साथ प्रैक्टिस कर रहे वैद्य के लिए भी एक सहायक मार्गदर्शक बन जाती है। आयुर्वेद, स्वास्थ्य और प्राकृतिक चिकित्सा से जुड़े किसी भी पाठक के लिए यह पुस्तक शरीर और स्वास्थ्य की गहराई को समझने का एक सुलभ, उपयोगी और ज्ञानवर्धक माध्यम है।

Additional Information

व्यक्ति, समाज अथवा राष्ट्र द्वारा किया जाने वाला सर्वाधिक प्रबल संवर्धनात्मक कार्य है—
स्वास्थ्य का संरक्षण, जीवन का विकास तथा आनन्द की साधना।
प्रगति और उन्नति की धुरी मानव का सुंदर एवं अनिमेय स्वास्थ्य, बलिष्ठ शरीर तथा सुदृढ़ मन की संरचना है।

निरन्तर गति मानव-जीवन की प्रगति का वरदान है। व्यक्ति हो या राष्ट्र—उसके कानों में सदा “चलते रहो, चलते रहो” की ध्वनि गूँजती रहनी चाहिए। जागृत और सचेत रहना ही जीवन है।

सोने का नाम कलियुग,
अंगड़ाई लेने का नाम द्वापर,
उठकर खड़े हो जाने का नाम त्रेता,
और चल पड़ने का नाम सतयुग है।

अतः हमें सतयुग के पथ पर चलने का व्रत लेना चाहिए।

जब तक “चरैवेति चरैवेति” के संगीत की धुन व्यक्ति या राष्ट्र के रथचक्रों में गूँजती रहती है, तब तक वे प्रगति और उन्नति के सोपानों पर आरोहण करते हुए अपने उच्चतम लक्ष्य की ओर अग्रसर रहते हैं।

मानव के भूत, वर्तमान एवं भविष्य जीवन का सर्वांगपूर्ण सामंजस्य स्थापित करना सांस्कृतिक विकास की एक बहुफलप्रदा विधा है। इसी परिप्रेक्ष्य में पूर्व और नूतन के समन्वय की कल्पना करना एक उच्च संस्कृति की उर्वर भूमिका तैयार करता है।

यह एक सुविचारित सूक्ति है कि—
“किसी वस्तु की उत्तमता की कसौटी उसका पुरानापन नहीं है, और न ही किसी वस्तु की निकृष्टता की कसौटी उसका नयापन।”

जो लोग बिना विवेक-विचार के दूसरों की बातों पर अमल करते हैं, वे बुद्धि-दारिद्र्य के कारण मूढ़ कहलाते हैं। बुद्धिसम्पन्न व्यक्ति गुण-दोष के आधार पर विचार-विमर्श कर निर्णय लेते हैं।

नएपन और पुरानेपन के प्रपंच में न पड़कर विवेकपूर्ण एवं साहसिक दृष्टिकोण अपनाते हुए, नूतन एवं प्राचीन ज्ञान-विज्ञान के समन्वय को स्वीकार करना ही श्रेयस्कर है—

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
चरैवेति चरैवेति ।

पुराणमित्येव न साधु सर्वं
न चापि काव्यं नवमित्यवद्यं ।
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते
मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ॥

(ऐतरेय ब्राह्मण)

जहाँ से भी जीवन-वृक्ष को पोषित करने वाली मूल्यवती ज्ञानधारा प्राप्त हो, उसे ग्रहण कर आयुर्वेद के साथ आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान का सामंजस्य स्थापित करना एक प्रशंसनीय बौद्धिक उपक्रम है।

इसी चित्तवृत्ति से अनुप्राणित होकर अधुनातन आयुर्वेद-मनीषियों ने आयुर्वेद के नवीन पाठ्यक्रम में आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान के अनेक विषयों का समावेश किया है, जो अत्यंत रमणीय एवं युगानुकूल प्रयास है।


ग्रन्थ का परिचय

प्रस्तुत ग्रन्थ “कायचिकित्सा”, भारतीय चिकित्सा केन्द्रीय परिषद, नई दिल्ली द्वारा निर्धारित
आयुर्वेदाचार्य (BAMS) पाठ्यक्रम के कायचिकित्सा विषय के तृतीय प्रश्नपत्र से सम्बद्ध है।

इस प्रश्नपत्र में अनेक विषय आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान से संबंधित हैं, जिन पर हिन्दी भाषा में ग्रन्थों का अभाव है। यह कृति उसी अभाव की पूर्ति का एक विनम्र प्रयास है।

यह प्रस्तुति—

  • पाठ्यक्रम के विषय-तम को विदीर्ण करने हेतु दीपशिखा है

  • नवीन विषयों के दण्डकारण्य में प्रवेश की पगडण्डी है

भविष्य में अधिक प्रकाश एवं राजपथ निर्माण हेतु आधुनिक तकनीकविद् विद्वानों को आगे आना चाहिए।


अध्याय-विन्यास

यह ग्रन्थ १६ अध्यायों में विभक्त है—

1. प्रथम अध्याय

वातव्याधि—निदान, रूक्षण, आवरण, चिकित्सा के सामान्य सिद्धान्त, विशिष्ट वातरोगों के लक्षण एवं चिकित्सा।

2. द्वितीय अध्याय

स्थौल्य, कायरोग, रिकेट्स, ऑस्टियोमलेशिया, बेरी-वेरी, पेलाग्रा तथा कुपोषणजन्य विकार।

3. तृतीय अध्याय

अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ—थायरॉयड, पिट्यूटरी, एड्रिनल, अग्न्याशय, बीजग्रन्थि आदि।

4. चतुर्थ अध्याय

आनुवंशिक रोग, पर्यावरण, देश-काल, जल-वायु, पर्यावरण परिवर्तनजन्य विकार।

5. पंचम अध्याय

विषाक्तता—खाद्य, औद्योगिक, पारा, सीसा आदि।

6. षष्ठ अध्याय

दम, एलर्जी, कीट-दंश, सर्पदंश एवं अन्य आकस्मिक रोग।

7. सप्तम अध्याय

व्याधि-समुच्चय, औषधि-प्रेरित विकार।

8. अष्टम अध्याय

शुक्ररोग—लक्षण एवं चिकित्सा।

9. नवम अध्याय

मन का स्वरूप।

10. दशम अध्याय

मनोविज्ञान, मानसिक रोगों का निदान।

11. एकादश अध्याय

मानसिक रोगों की चिकित्सा एवं उन्माद।

12. द्वादश अध्याय

अपस्मार, मनोविक्षिप्ति, सिज़ोफ्रेनिया, अवसाद, भ्रम आदि।

13. त्रयोदश अध्याय

आपातकालीन चिकित्सा, दग्ध, रक्तस्राव, द्रव-विद्युत असंतुलन।

14. चतुर्दश अध्याय

उदरशूल, श्वासकष्ट, बृक्कशूल।

15. पंचदश अध्याय

मूत्रावरोध, आंत्रावरोध, मूर्च्छा।

16. षोडश अध्याय

मधुमेहजन्य उपद्रव, तीव्र ज्वर, औषध-प्रतिक्रिया एवं विषाक्तता।


उपसंहार

इस ग्रन्थ में कायचिकित्सा के तृतीय प्रश्नपत्र के समस्त विषयों को सरल, सुबोध एवं सुनियोजित रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। उद्देश्य यही है कि पाठक अल्प परिश्रम में विषय को आत्मसात कर सकें और अध्ययन में रुचि, जिज्ञासा एवं संतोष अनुभव करें।

पूर्व प्रकाशित ग्रन्थों को प्राप्त स्नेह एवं सम्मान ही मेरी लेखनी की सतत प्रेरणा है।

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