| Author | Pandit Gopesh Kumar Ojha |
| Genre | Astrology Books |
| Language | Hindi |
| Pages | 190 |
| File Size | 6 |
Book Summary
अंक विद्या (ज्योतिष) – पंडित गोपेश कुमार ओझा
“अंक विद्या (ज्योतिष) – Numerology” में पंडित गोपेश कुमार ओझा ने अंकों के आधार पर भविष्य‑फल और व्यक्तित्व विश्लेषण को सरल और व्यवस्थित तरीके से समझाया है। पारंपरिक ज्योतिष में जहाँ लग्न, ग्रह, भाव, दशा आदि की जटिल गणना करनी पड़ती है, वहीं यह पुस्तक दिखाती है कि केवल जन्म‑तिथि और नाम के अंकों से भी जीवन के शुभ‑अशुभ रुझान, अवसर और चुनौतियाँ पहचानी जा सकती हैं।
लेखक पाठक को step‑by‑step यह सिखाते हैं कि कैसे विभिन्न अंकों का मूल स्वभाव समझें, कौन‑से दिन और तारीखें आपके लिए अधिक अनुकूल रहती हैं, और कब किसी संख्या का परिणाम दूसरे ग्रहों के प्रभाव से बदल सकता है। उदाहरणों और व्यावहारिक नियमों के ज़रिए यह किताब शुरुआती पाठकों के लिए भी उपयोगी गाइड बन जाती है, साथ ही ज्योतिष के गंभीर विद्यार्थियों के लिए संदर्भ‑ग्रंथ का काम भी करती है।
जो पाठक “अंक विद्या ज्योतिष”, “Hindi numerology book”, या “Ank Vidya Gopesh Kumar Ojha PDF/Book” जैसे विषय खोज रहे हैं, उनके लिए यह पुस्तक भरोसेमंद, शोध‑आधारित और आसान भाषा में लिखी गई मानक कृति मानी जाती है।
Additional Information
“वनं समाश्रिता येऽपि निर्ममा निष्परिग्रहाः ।
अपि ते परिपृच्छन्ति ज्योतिषां गतिकोविदिम् ॥”
जो सर्वसंग परित्याग कर वन का समाश्रय ले चुके हैं, ऐसे रागद्वेष-शून्य, निष्परिग्रह मुनिजन-सन्त-महात्मा भी ज्योतिष शास्त्र-वेत्ताओं से भविष्य ज्ञात करने के लिये उत्सुक रहते हैं, तब साधारण सांसारी प्राणी की तो चर्चा ही क्या?
प्रायः इस भविष्य-ज्ञान की प्राप्ति ज्योतिष शास्त्र के द्वारा होती है। ज्योतिष शास्त्र अथाह सागर है। जन्म कुण्डली निर्माण के लिये जन्म का स्थान, ठीक समय का ज्ञान आदि परमावश्यक है। शुद्ध लग्न, भाव-स्पष्ट, ग्रह-स्पष्ट, मान्दि-स्पष्ट, मित्रामित्र-चक्र, सप्तवर्गी चक्र, दशवर्ग, दशा, अन्तर्दशा, अष्टक वर्ग, सर्वाष्टक वर्ग आदि बनाने में बहुत गणित करना पड़ता है और यह परिश्रम-साध्य है। फलादेश में भी अनेक विचारों का सामंजस्य करना पड़ता है। वृहत् ज्योतिष शास्त्र की परिक्रमा लगाना वैसा ही कठिन है जैसा पृथ्वी की परिक्रमा लगाना।
पृथ्वी की परिक्रमा के सम्बन्ध में पुराणों में एक कथा है कि एक बार स्वामी कार्तिक तथा गणेश जी दोनों ने आग्रह किया कि उनका विवाह हो। स्वामी कार्तिक चाहते थे पहले उनका विवाह हो तथा गणेश जी चाहते थे पहले उनका विवाह। तब उनके माता-पिता ने कहा कि जो पहले पृथ्वी की परिक्रमा पूर्ण कर आवेगा उसी का विवाह पहले किया जावेगा।
स्वामी कार्तिक अपने वाहन मयूर पर चढ़कर द्रुतगति से चले और देखते-देखते आँखों से ओझल हो गये। गणेश जी का शरीर भारी और वाहन छोटा-सा ‘मूषक’। सो विचार में पड़ गये कि कैसे परिक्रमा पूर्ण करूँ? उन्होंने अपने माता-पिता को बैठाया, उनके चरणों का पूजन कर सात बार माता-पिता की परिक्रमा की और प्रणाम कर कहा—
“मैंने पृथ्वी की परिक्रमा कर ली। भाई एक बार भी परिक्रमा करके नहीं आये। अब पहले मेरा विवाह कीजिए।”
शास्त्रों में माता-पिता का पूजन और परिक्रमा पृथ्वी-परिक्रमा के समान है। इस युक्ति से गणेश जी का विवाह हो गया और उन्हें ऋद्धि-बुद्धि — ये दोनों विश्वरूप प्रजापति की दो सुन्दरी कन्याएँ — पत्नी रूप में प्राप्त हुईं।
कहने का तात्पर्य यह है कि जो सज्जन ज्योतिष शास्त्र की बृहत् परिक्रमा में अक्षम हैं, वे गणेश जी के उपर्युक्त उदाहरण को लेकर “जगु विद्या” का अभ्यास करें, तो थोड़े परिश्रम से केवल अंग्रेज़ी की जन्म-तारीख, नाम, अथवा प्रश्न से भविष्य का बहुत-कुछ शुभाशुभ जान सकते हैं।
अंग्रेज़ी में Numerology की अनेक पुस्तकें हैं, किन्तु हिन्दी में अंक-विद्या (ज्योतिष) की कोई पुस्तक मेरे देखने में नहीं आई। अनेक ग्रन्थों का अध्ययन तथा अनुशीलन कर यह पुस्तक पाठकों के सम्मुख रखी जा रही है।
“शरणं करवाणि कामदं ते चरणं वाणि चराचरोपजीव्यम् ।
करुणामसूर्णः कटाक्षपातैः कुरु मामम्ब कृतार्थसार्थवाहम् ॥”
अंक-विद्या (ज्योतिष)
अंक-विद्या रहस्य
संसार में हम जो भिन्न-भिन्न वस्तुएँ देखते हैं, उनके अनेक रूप हैं। विविध रंगों के मिलने से नये रंग बन जाते हैं। लाल और पीला मिलाने से नारंगी रंग बन जाता है। पीला और नीला मिलाने से हरा। इस प्रकार सैकड़ों, हज़ारों रंग बन सकते हैं, परन्तु इनके मूल में वही सात रंग हैं जो इन्द्रधनुष में दिखाई देते हैं।
इन सात रंगों के मूल में भी एक ही रंग रह जाता है, जो सफ़ेद अथवा रंगरहित शुद्ध प्रकाश है। सूर्य की प्रकाश-रेखा को ‘प्रिज़्म’ में पार करने से सात रंग स्पष्ट दिखाई देते हैं। वैसे सूर्य की किरण शुद्ध, उज्ज्वल, विनारंग प्रतीत होती है।
इसी प्रकार संसार की जो विविध वस्तुएँ हमें दिखाई देती हैं, उनमें पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तत्त्व हैं। उनमें तत्त्वों का सम्मिश्रण भिन्न-भिन्न अनुपात और भिन्न-भिन्न प्रकार से है। किसी में कोई तत्त्व कम है, किसी में कोई अधिक। परन्तु यह समस्त जगत् केवल पाँच तत्त्वों का प्रपंच है।
ये पाँच तत्त्व भी केवल आकाश से उत्पन्न हुए हैं — आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी। पृथ्वी का गुण ‘गन्ध’, जल का ‘रस’, अग्नि का ‘तेज’ (रूप), वायु का ‘स्पर्श’ और आकाश का गुण ‘शब्द’ है। जैसे संसार के सभी पदार्थों के मूल में आकाश तत्त्व है, उसी प्रकार हम यह कह सकते हैं कि संसार के सभी पदार्थों का मूल गुण ‘शब्द’ है।
इसी कारण शब्द को ‘शब्द-ब्रह्म’ — अर्थात् परम प्रभु परमेश्वर का प्रतीक — माना गया है।
परिणामतः तो सब शब्द ब्रह्म के रूप ही हैं, किन्तु भिन्न-भिन्न शब्दों का गुण और प्रभाव भी भिन्न-भिन्न है, और प्रत्येक शब्द को अंक या संख्या में परिवर्तित कर उसकी माप की जा सकती है। कोई शब्द (या शब्दावली) ७००० बार आवृत्ति करने पर पूर्णता को प्राप्त होता है, तो किसी का १७००० बार आवृत्ति करने पर परिपाक होता है।
‘संख्या’ और ‘शब्द’ के सम्बन्ध से हमारे ऋषि-महर्षि पूर्णतः परिचित थे। इसी कारण सूर्य के मन्त्र का जप ७०००, चन्द्रमा का ११०००, मंगल का १००००, बुध का ६०००, वृहस्पति का १६०००, शुक्र का १६०००, शनि का २३०००, राहु का १८००० और केतु का १७००० जप निर्धारित किया गया है।
किसी देवता के मन्त्र में २२ अक्षर होते हैं तो किसी के मन्त्र में ३६। ‘शब्द’ और ‘संख्या’ का घनिष्ठ वैज्ञानिक सम्बन्ध है।
इसी प्रकार संख्या और क्रिया का भी घनिष्ठ सम्बन्ध है। शून्य संख्या (०) निष्क्रिय, निराकार, निर्विकार ‘ब्रह्म’ का द्योतक है और ‘१’ पूर्ण ब्रह्म की उस स्थिति का द्योतक है, जब वह अद्वैत रूप से रहता है। कहने का तात्पर्य यह है कि ‘शब्द’ और ‘संख्या (अंक)’ में सम्बन्ध होने के कारण समस्त पदार्थों के मूल में जैसे ‘शब्द’ है—
