| Author | Dharamvir Bharati |
| Genre | Literature |
| Language | Hindi |
| Pages | 389 |
| File Size | 10 |
Book Summary
“गुनाहों का देवता” हिंदी साहित्य का एक कालजयी प्रेम उपन्यास है, जो प्री-स्वतंत्रता काल के इलाहाबाद जैसे विश्वविद्यालयी शहर की पृष्ठभूमि पर आधारित है। कहानी चंदर और सुधा के सूक्ष्म, गहरे और अनकहे प्रेम संबंध को केंद्र में रखती है, जहाँ सामाजिक मर्यादाएँ, जाति-भेद और आदर्शवाद उनके व्यक्तिगत भावों से लगातार टकराते रहते हैं।
उपन्यास में प्रेम, त्याग, नैतिकता, आत्म-संघर्ष और सामाजिक दबाव जैसे विषयों को बेहद संवेदनशील और यथार्थपूर्ण ढंग से चित्रित किया गया है। चंदर का अपने आदर्शों और सुधा के प्रति प्रेम के बीच झूलता हुआ मन, और उसके निर्णयों से पैदा हुई अपराधबोध व पश्चाताप की भावना, पाठक को भीतर तक झकझोर देती है।
यह किताब सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं, बल्कि उस समय के मध्यवर्गीय समाज की मानसिकता, पितृसत्तात्मक सोच और परंपरागत मूल्यों की भी गहरी पड़ताल करती है। धर्मवीर भारती की सरल, भावपूर्ण और प्रभावशाली भाषा इस उपन्यास को छात्रों, साहित्य प्रेमियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले पाठकों के लिए भी विशेष रूप से महत्वपूर्ण बनाती है।
Additional Information
अगर पुराने जमाने की नगर-देवता की और ग्राम-देवता की कल्पनाएँ आज भी मान्य होतीं, तो मैं कहता कि इलाहाबाद का नगर-देवता ज़रूर कोई रोमॅण्टिक कलाकार है। ऐसा लगता है कि इस शहर की बनावट, गठन, ज़िन्दगी और रहन-सहन में कोई बँधे-बँधाए नियम नहीं, कहीं कोई कसाव नहीं, हर जगह एक स्वच्छन्द खुलापन, एक बिखरी हुई-सी अनियमितता।
बनारस की गलियों से भी पतली गलियाँ, और लखनऊ की सड़कों से भी चौड़ी सड़कें। यार्कशायर और ब्राइटन के उपनगरों का मुक़ाबला करने वाली सिविल लाइन्स और दलदलों की गन्दगी को मात करने वाले मुहल्ले। मौसम में भी कहीं कोई सम नहीं, कोई सन्तुलन नहीं। सुबह मलयज, दोपहर नगाड़ा, तो शामें रेशमी। धरती ऐसी कि सहारा के रेगिस्तान की तरह बालू भी मिले, मालवा की तरह हरे-भरे खेत भी मिलें और ऊसर और परती की भी कमी नहीं।
सचमुच लगता है कि प्रयाग का नगर-देवता स्वर्ग-कुंजों से निर्वासित कोई मनमौजी कलाकार है, जिसके सृजन में हर रग के डोरे हैं।
और चाहे जो हो, मगर इधर क्वार-कातिक तथा उधर वसन्त के गद और होली के बीच के मौसम में इलाहाबाद का वातावरण नैस्टशियम और पैडी के फूलों से भी ज़्यादा खूबसूरत और आम के बौरों की खुशबू से भी ज़्यादा महकदार होता है। सिविल लाइन्स हो या अल्फ़्रेड पार्क, गंगातट हो या खुशरूवाग, लगता है कि हवा एक नटखट दोशीज़ा की तरह कलियों के आँचल और लहरों के मिज़ाज से छेड़खानी करती चलती है।
और अगर आप सर्दी से बहुत नहीं डरते, तो ज़रा एक ओवरकोट डालकर सुबह-सुबह घूमने निकल जाइए, तो इन खुली हुई जगहों की फ़िज़ा इठलाकर आपको अपने जादू में बाँध लेगी। ख़ास तौर से पौ फटने के पहले तो आपको एक बिल्कुल नयी अनुभूति होगी। वसन्त के नये-नये मौसमी फूलों के रंग से मुक़ाबला करने वाली हलकी सुमहली, बाल-सूर्य की अँगुलियाँ सुबह की राजकुमारी के गुलाबी वक्ष पर बिखरे हुए भौंराले गेसुओं को धीरे-धीरे हटाती जाती हैं और क्षितिज पर सुनहली तरुणाई बिखर पड़ती है।
एक ऐसी ही ख़ुशनुमा सुबह थी, और जिसकी कहानी मैं कहने जा रहा हूँ, वह सुबह से भी ज़्यादा मासूम युवक, प्रभाती गाकर फूलों को जगाने वाले देवदूत की तरह अल्फ़्रेड पार्क के लॉन पर फूलों की सरज़मी के किनारे-किनारे घूम रहा था।
कटाई स्वीटपी के रंग का पश्मीने का लम्बा कोट, जिसका एक कॉलर उठा हुआ था और दूसरे कॉलर में सरसों की एक पत्ती बटन-होल में लगी हुई थी। सफ़ेद मवरान कीन का पतला पैंट और पैरों में सफ़ेद पारी की पेशावरी सैण्डलें। भरा हुआ गोरा चेहरा और ऊँचे चमकते हुए माथे पर झूलती हुई एक पी-भूरी लट।
चलते-चलते उसने एक रंग-बिरंगा गुच्छा इकट्ठा कर लिया था और रह-रह कर वह उसे सूँघ लेता था।
पूरब के वाममान की गुलाबी पाँखुरियाँ बिखरने लगी थीं और सुनहले पराग की एक बौछार सुबह के ताज़े फूलों पर निछर रही थी।
“अरे, सुबह हो गयी।”
उसने चौंककर कहा और पार्क की एक बेंच पर बैठ गया। सामने से एक माली आ रहा था।
“क्यों जी, लाइब्रेरी खुल गयी?”
“अभी नहीं बाबूजी।” उसने जवाब दिया।
वह फिर सन्तोष से बैठ गया और फूलों की पाँखुरियाँ नोचकर नीचे करने लगा। धीरे-धीरे बगीचे में ओस की चादर परत-दर-परत बिछती जा रही थी। नीले पेड़ों की छायाएँ और भी गहराने लगी थीं। उसकी बाँह में मीठी खुशबू से भरी चुनी हुई पत्तियाँ बिखरी थीं और एक फूल बाकी रह गया था। हलके फ़ालसई रंग के उस फूल पर गहरे बैजनी डोरे थे।
“हैलो कपूर।”
सहसा किसी ने पीछे से कन्धे पर हाथ रखकर कहा—
“यहाँ क्या शक्ल बना रहे हो सुबह-सुबह?”
उसने मुड़कर पीछे देखा—
“अरे, बानो ठाकुर साहब! आओ बैठो यार, लाइब्रेरी खुलने का इन्तज़ार कर रहा हूँ।”
“क्यों, यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी चाट डाली, अब इसे तो शरीफ़ लोगों के लिए छोड़ दो।”
“हाँ-हाँ, शरीफ़ लोगों के लिए ही छोड़ रहा हूँ। डॉक्टर शुक्ला की लड़की है न, वह इसकी मेम्बर बनना चाहती थी, तो मुझे जाना पड़ा। उसी का इन्तज़ार भी कर रहा हूँ।”
“डॉक्टर शुक्ला तो पॉलिटिक्स डिपार्टमेण्ट में हैं।”
“नहीं, गवर्नमेण्ट साइकोलॉजिकल ब्यूरो में।”
“और तुम पॉलिटिक्स में रिसर्च कर रहे हो।”
“नहीं, इकनॉमिक्स में।”
“बहुत अच्छे! तो उनकी लड़की को सदस्य बनवाने आये हो?”
कुछ अजीब स्वर में ठाकुर ने कहा।
“छि!”
कपूर ने कुछ हँसते हुए, कुछ अपने को बचाते हुए कहा—
“यार, तुम जानते हो कि मेरा उनसे कितना घरेलू सम्बन्ध है। जब से मैं प्रयाग में हूँ, उन्हीं के सहारे हूँ, और फिर आजकल तो उन्हीं के यहाँ पढ़ता-लिखता भी हूँ।”
ठाकुर साहब हँस पड़े—
“अरे भाई, मैं डॉक्टर शुक्ला को जानता नहीं क्या? उनका-सा भला आदमी मिलना मुश्किल है। तुम सफ़ाई व्यर्थ में दे रहे हो।”
ठाकुर साहब यूनिवर्सिटी के उन विद्यार्थियों में से थे जो बेतरह विद्यार्थी होते हैं और कब तक वे यूनिवर्सिटी को सुशोभित करते रहेंगे।
