| Author | Nandlal Dashora |
| Genre | Ayurveda Books |
| Language | Hindi |
| Pages | 250 |
| File Size | 9 |
Book Summary
“पतंजलि योग सूत्र योग दर्शन” : “नंदलाल दशोरा” पुस्तक योग विज्ञान का मूल ग्रंथ है, जिसमें महर्षि पतंजलि के 196 सूत्रों का मूल, पदच्छेद, अनुवाद और सरल व्याख्या दी गई है।
यह पुस्तक चित्तवृत्ति निरोध को योग बताती है, जो आत्मा को उसके स्वरूप में स्थापित करता है। चार पादों—समाधि, साधना, विभूति और कैवल्य—में अष्टांग योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम आदि) का विस्तार से वर्णन है।
क्लेश नाश, प्रकृति-पुरुष संयोग, संयम साधना और कैवल्य प्राप्ति के व्यावहारिक मार्ग को स्पष्ट करती यह किताब योग साधकों, विद्यार्थियों और आध्यात्मिक खोजियों के लिए आदर्श है। नंदलाल दशोरा की सहज व्याख्या इसे सभी स्तर के पाठकों के लिए सुलभ बनाती है।
Additional Information
पातंजल योग सूत्र
योग दर्शन
योग की मान्यतानुसार ‘प्रकृति’ तथा ‘पुरुष’ (चेतन आत्मा) दो भिन्न तत्व हैं जो अनादि हैं। इन दोनों के संयोग से ही इस समस्त जड़-चेतनमय सृष्टि का निर्माण हुआ है। प्रकृति जड़ है, जो सत्व, रज तथा तम—तीन गुणों से युक्त है। इसके साथ जब चेतना (पुरुष) का संयोग होता है, तब उसमें हलचल होती है तथा सृष्टि-निर्माण की प्रक्रिया आरम्भ होती है।
यहाँ ‘प्रकृति’ दृश्य है तथा ‘पुरुष’ दृष्टा है। इस सृष्टि में सर्वत्र प्रकृति ही दिखाई देती है; पुरुष कहीं दिखाई नहीं देता, किन्तु प्रकृति का यह सम्पूर्ण कार्य उस पुरुष-तत्व की प्रधानता से ही हो रहा है। ये दोनों इस प्रकार संयुक्त हो गए हैं कि इन्हें अलग-अलग पहचानना कठिन है—इसका कारण अविद्या है।
‘पुरुष’ सर्वज्ञ है तथा प्रकृति के हर कण में व्याप्त होने से वह सर्वव्यापी भी है। जीव भी इन दोनों के ही संयोग का परिणाम है। उस ‘पुरुष’ को शरीर में ‘आत्मा’ तथा सृष्टि में ‘विश्वात्मा’ कहा जाता है।
योग का अर्थ है—मिलना, जुड़ना, संयुक्त होना। जिस विधि से साधक अपने प्रकृति-जन्य विकारों को त्याग कर अपनी आत्मा के साथ संयुक्त होता है, वही योग है। यह आत्मा ही उसका निज स्वरूप है तथा यही उसका स्वभाव है। अन्य सभी स्वरूप प्रकृति-जन्य हैं, जो अज्ञानवश अपने ज्ञात होते हैं।
इन मुखौटों को उतारकर अपने वास्तविक स्वरूप को उपलब्ध हो जाना ही योग है। यही उसकी ‘कैवल्यावस्था’ तथा ‘मोक्ष’ है।
योग की अनेक विधियाँ हैं। कोई किसी का भी अवलम्बन करे, अन्तिम परिणाम वही होगा। विधियों की भिन्नता के आधार पर योग के अनेक नाम हैं, जैसे—
- राजयोग
- ज्ञानयोग
- कर्मयोग
- भक्तियोग
- संन्यासयोग
- बुद्धियोग
- हठयोग
- नादयोग
- लययोग
- बिन्दुयोग
- ध्यानयोग
- क्रियायोग
किन्तु सबका एक ही ध्येय है—उस पुरुष (आत्मा) के साथ अभेद सम्बन्ध स्थापित करना।
महर्षि पतंजलि का यह योग-दर्शन इन सब में श्रेष्ठ है तथा ज्ञान-उपलब्धि का विधिवत मार्ग बताता है। यह शरीर, इन्द्रियों तथा मन को पूर्णतः अनुशासित करके चित्त की वृत्तियों का निरोध करता है। पतंजलि चित्त-वृत्तियों के निरोध को ही ‘योग’ कहते हैं, क्योंकि इनके पूर्ण निरोध से आत्मा अपने स्वरूप में स्थित हो जाती है।
इस निरोध के लिए वे अष्टांग योग का मार्ग बताते हैं—
- यम
- नियम
- आसन
- प्राणायाम
- प्रत्याहार
- धारणा
- ध्यान
- समाधि
यह मार्ग निरापद है; इसलिए इसे अनुशासन कहा गया है, जो परम्परागत तथा अनादि है। इस मार्ग पर चलने से न किसी प्रकार का भय होता है, न कोई अनिष्ट, न ही मार्ग में अवरोध। जहाँ-जहाँ अवरोध आते हैं, उनका इस ग्रन्थ में स्थान-स्थान पर वर्णन किया गया है, जिससे साधक उनसे बचता हुआ अपने गन्तव्य तक पहुँच सके।
प्रकृति-पुरुष सिद्धान्त
योग-दर्शन के अनुसार ‘प्रकृति’ तथा ‘पुरुष’—दोनों अनादि एवं भिन्न तत्व हैं। इनके संयोग से ही जड़-चेतनमय सृष्टि का निर्माण हुआ है। प्रकृति त्रिगुणात्मक है—सत्व, रज और तम। चेतन पुरुष के संयोग से उसमें सृष्टि-विस्तार की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है।
इस सृष्टि में प्रकृति ही सर्वत्र दृश्य है, पुरुष अदृश्य होते हुए भी प्रधान है। इन दोनों की अभिन्न प्रतीति का कारण अविद्या है। ‘पुरुष’ सर्वज्ञ तथा सर्वव्यापी है। जीव भी इन्हीं दोनों के संयोग का परिणाम है। शरीर में वही आत्मा और सृष्टि में वही विश्वात्मा है, जिसे योग-दर्शन में ‘पुरुष-विशेष’ कहा गया है। इसलिए यह सेश्वर दर्शन है।
सृष्टि-उत्पत्ति का क्रम
त्रिगुणात्मक प्रकृति ‘अलिंग’ (अव्यक्त) अवस्था में रहती है। जब चेतन पुरुष में सृष्टि-विस्तार का संकल्प होता है, तब वह इस माया-स्वरूपा प्रकृति का स्वेच्छा से वरण करता है।
भगवद्गीता में कहा गया है—
“हे अर्जुन! मेरी महत् ब्रह्मरूप प्रकृति अर्थात् त्रिगुणमयी माया सम्पूर्ण भूतों की योनि है और मैं उस योनि में चेतन-रूप बीज का स्थापन करता हूँ। उस जड़-चेतन के संयोग से सब भूतों की उत्पत्ति होती है।”
(गीता 14/3)
इसी संयोग से महत्तत्व (चित्त) की उत्पत्ति होती है। शरीर में इसे चित्त तथा सृष्टि में महत्तत्व कहा जाता है।
त्रिगुणों के धर्म
- सत्व — प्रकाश, ज्ञान
- रज — क्रिया, गति
- तम — जड़ता, स्थिति, सुषुप्ति
चित्त में अहंकार उत्पन्न होता है, जिससे अस्मिता का भाव आता है। इसी से मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, तन्मात्राएँ तथा महाभूतों की रचना होती है।
मोक्ष एवं कैवल्य
प्रकृति-पुरुष के संयोग से जिस क्रम में जीव का विकास होता है, उसके उल्टे क्रम से चलने पर साधक को इन दोनों की भिन्नता का ज्ञान हो जाता है। तब यह भी स्पष्ट हो जाता है कि इस संयोग का कारण अविद्या है।
अज्ञान का आवरण हटते ही साधक अपने वास्तविक स्वरूप—चेतन आत्मा—को जान लेता है। इसके बाद प्रकृति अपने कारण में लय हो जाती है और आत्मा अपने स्वरूप में स्थित हो जाती है। यही उसकी कैवल्य-अवस्था तथा मोक्ष है।
गीता में कहा गया है—
“यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम”
(गीता 15/6)
जीव की उत्पत्ति चैतन्य आत्मा से है और पुनः उसी को प्राप्त हो जाना उसकी अन्तिम परिणति है—यही उसका गन्तव्य है।
यह योग-दर्शन अपने आप में पूर्ण, सार्वभौम एवं वैज्ञानिक है। इसमें न सम्प्रदाय की संकीर्णता है, न धार्मिक भेदभाव। इसका प्रयोग देश, काल, धर्म, जाति, लिंग आदि से परे किया जा सकता है। यह मानव-जाति की अमूल्य धरोहर है।
जिस प्रकार तैरना सीखने के लिए केवल पुस्तक-ज्ञान पर्याप्त नहीं, उसी प्रकार किसी ग्रन्थ को पढ़ लेने मात्र से आत्म-ज्ञान नहीं होता। यह ज्ञान गुरु-मार्गदर्शन में स्वयं की साधना से प्राप्त होता है। सभी ग्रन्थ केवल मार्ग दिखाते हैं—चलना साधक को स्वयं पड़ता है।
इस ग्रन्थ की व्याख्या का उद्देश्य सामान्य जनों में योग-साधना के प्रति रुचि जाग्रत करना है। इसलिए शब्दार्थ की अपेक्षा भावों को प्रधानता दी गई है, जिससे यह कठिन विषय बोधगम्य हो सके।
अन्त में, उन सभी के प्रति कृतज्ञता, जिनकी ज्ञात-अज्ञात प्रेरणा एवं मार्गदर्शन से यह कार्य पूर्ण हो सका।
