Madhyakalin Bharat by Satish Chandra | मध्यकालीन भारत : सतीश चंद्र

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Madhyakalin Bharat
AuthorSatish Chandra
GenreHistory
LanguageHindi
Pages216
File Size10
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Book Summary

“मध्यकालीन भारत” : “सतीश चंद्र” पुस्तक 8वीं से 18वीं शताब्दी तक के भारतीय इतिहास का विस्तृत और प्रमाणिक विवरण प्रस्तुत करती है। यह दिल्ली सल्तनत, मुगल साम्राज्य, विजयनगर, बहमनी, चोल साम्राज्य, मराठा उदय, भक्ति-सूफी आंदोलनों और यूरोपीय आगमन जैसे महत्वपूर्ण विषयों को सरल भाषा में समझाती है।​​

सतीश चंद्र ने राजनीतिक घटनाओं के साथ सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों को भी गहराई से विश्लेषित किया है। बाबर से औरंगजेब तक के शासकों, प्रशासनिक व्यवस्था, व्यापार, समाज संरचना और धार्मिक संवाद पर विशेष ध्यान है।​

UPSC, PCS जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं, इतिहास छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए यह आदर्श संदर्भ पुस्तक है। स्पष्ट तथ्य, कालानुक्रमिक प्रस्तुति और संतुलित विश्लेषण इसे सभी स्तर के पाठकों के लिए उपयोगी बनाते हैं।

Additional Information

शिक्षा की नई प्रणाली में उच्चतर माध्यमिक स्तर (+2 स्तर) को सीमावर्ती माना गया है। यह स्तर विद्यार्थियों को जीवन में प्रवेश कराने के साथ-साथ उच्च शिक्षा के लिए तैयार करता है। सामान्य शिक्षा के लिए कक्षा I से X तक के पाठ्यक्रम बिना किसी असमानता के बनाए गए हैं। उच्चतर माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थी को उसकी रुचि के अनुसार कुछ विषयों में विशेष अध्ययन की ओर प्रवर्तित किया जाता है।

इतिहास संपादक-मंडल ने +2 स्तर की पाठ्यचर्याओं को अंतिम रूप दिया तथा उनके आधार पर पाठ्यपुस्तकों के निर्माण का कार्य आरम्भ किया।


प्रस्तुत खंड मध्यकालीन भारत का एक ऐतिहासिक सर्वेक्षण प्रस्तुत करता है। इसकी रचना प्रोफ़ेसर सतीश चन्द्र ने की है, जो इतिहास संपादक-मंडल के अध्यक्ष भी हैं। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (NCERT) उनके प्रति आभारी है।

इस पुस्तक से संबद्ध अनेक विषयों में सहायता और सहयोग के लिए परिषद्, परिषद् से संबद्ध अथवा असंबद्ध अनेक सज्जनों और संस्थाओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करती है। विशेष रूप से—

  • डॉ० शिव कुमार सैनी एवं कुमारी इन्दिरा श्रीनिवासन — प्रेस-प्रतिलिपि तैयार करने में सहयोग के लिए
  • श्री शफ़ोना हसन खान — प्रश्न-अभ्यास निर्माण के लिए
  • श्री ए० के० घोष — मानचित्र निर्माण के लिए
  • भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण — पुस्तक में प्रयुक्त फ़ोटो-ग्राफ़ उपलब्ध कराने के लिए

मूल अंग्रेज़ी पुस्तक का हिन्दी अनुवाद श्रीमती देवलीना एवं डॉ० सुरेश धींगड़ा ने किया है। हिन्दी अनुवाद की प्रेस-प्रतिलिपि तैयार करने तथा मुद्रण में सहायता के लिए परिषद् प्रकाशन विभाग के प्रति आभारी है।


उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं के लिए परिषद् द्वारा प्रकाशित पुस्तकमाला में मध्यकालीन भारत दूसरी पुस्तक है। इसका प्रकाशन दो भागों में किया जा रहा है—

  • प्रथम भाग — पूर्व में प्रकाशित
  • द्वितीय भाग — वर्तमान पुस्तक

इस प्रकाशन के किसी भी पक्ष से संबंधित सुझाव, टिप्पणी अथवा आलोचना का राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् स्वागत करती है।


विद्यालय के प्रथम दस वर्षों की सामान्य शिक्षा में इतिहास एक महत्वपूर्ण अंग है। इस स्तर तक इतिहास के पाठ्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को भारत एवं विश्व के इतिहास की प्रमुख प्रवृत्तियों और विकास-क्रम से परिचित कराना है।

इसी आधार पर ‘+2’ अर्थात् उच्चतर माध्यमिक स्तर के पाठ्यक्रम तैयार किए गए हैं, जिनके मुख्य उद्देश्य हैं—

  • विद्यार्थी के ऐतिहासिक ज्ञान को समृद्ध करना
  • इतिहास विषय की प्रकृति और शक्तियों से परिचित कराना
  • इतिहास के उच्च अध्ययन के लिए विद्यार्थी को तैयार करना

उच्चतर माध्यमिक स्तर के इतिहास पाठ्यक्रम तैयार करने से पूर्व संपादक-मंडल ने शिक्षकों, शिक्षक-प्रशिक्षकों तथा विशेषज्ञों से व्यापक विचार-विमर्श किया। इस पाठ्यचर्या में भारत के बाहर के क्षेत्रों के इतिहास पर वैकल्पिक पाठ्यक्रम भी सम्मिलित हैं।


मध्यकालीन भारत : काल-सीमा एवं विषय-वस्तु

प्रस्तुत पुस्तक में लगभग आठवीं शताब्दी से अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ तक के मध्यकालीन भारत के इतिहास को दो भागों में समेटा गया है।

इसमें उन कारकों और आधारों पर विशेष बल दिया गया है, जिन्होंने मध्यकाल में भारतीय समाज और संस्कृति का निर्माण किया। इस काल में समाज एवं संस्कृति में हुए महत्वपूर्ण परिवर्तनों की विस्तृत चर्चा की गई है।

भारत के विभिन्न भागों में रहने वाले तथा विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोगों के योगदान को विशेष महत्व दिया गया है।

इस पुस्तक के लेखन का दायित्व स्वीकार करने के लिए संपादक-मंडल प्रोफ़ेसर सतीश चन्द्र का आभार व्यक्त करता है तथा उन सभी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है जिन्होंने इसके निर्माण और प्रकाशन में सहयोग दिया।


उत्तर भारत में साम्राज्य के लिए संघर्ष

मुग़ल और अफ़ग़ान (1525–1556)

पन्द्रहवीं शताब्दी में मध्य एवं पश्चिम एशिया में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। चौदहवीं शताब्दी में मंगोल साम्राज्य के विघटन के पश्चात् तैमूर ने ईरान और तुरान को पुनः एक शासन के अन्तर्गत संगठित किया।

तैमूर का साम्राज्य वोल्गा नदी के निचले भाग से सिन्धु नदी तक फैला हुआ था। इसमें एशिया माइनर (आधुनिक तुर्की), ईरान, ट्रांस-ऑक्सियाना, अफ़ग़ानिस्तान और पंजाब का एक भाग सम्मिलित था।

1404 ई० में तैमूर की मृत्यु के बाद उसके पोते शाहरुख़ मिर्ज़ा ने साम्राज्य के अधिकांश भाग को संगठित रखा। उसने कला और विद्वानों को संरक्षण दिया। उसके शासनकाल में समरक़न्द और हिरात पश्चिम एशिया के प्रमुख सांस्कृतिक केन्द्र बन गए।


तैमूरी साम्राज्य का पतन और नई शक्तियाँ

पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में तैमूरी साम्राज्य की शक्ति तेजी से घटने लगी। इसका मुख्य कारण साम्राज्य को विभाजित करने की परम्परा थी। इससे अनेक तैमूरी रियासतें बनीं, जो आपस में संघर्ष करती रहीं।

इस स्थिति का लाभ उठाकर नए तत्व उभरे—

  • उत्तर से उज़्बेक जाति ने ट्रांस-ऑक्सियाना में प्रवेश किया
  • पश्चिम में ईरान में सफ़वी वंश का उदय हुआ

उज़्बेक इस्लाम के सुन्नी मत के अनुयायी थे, जबकि सफ़वी शिया मत के समर्थक थे। इस साम्प्रदायिक भेद के कारण संघर्ष और तीव्र हो गया।

ईरान के पश्चिम में ऑटोमन तुर्कों की शक्ति भी उभर रही थी, जो पूर्वी यूरोप, इराक़ और ईरान पर अधिकार स्थापित करना चाहते थे।

इस प्रकार सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ तक एशिया में तीन महान साम्राज्य शक्तियों के बीच संघर्ष की भूमिका तैयार हो चुकी थी।


बाबर का उदय

1494 ई० में ट्रांस-ऑक्सियाना की एक छोटी-सी रियासत फ़रग़ाना का उत्तराधिकारी बाबर बना। उस समय तैमूरी राजकुमार आपस में संघर्षरत थे और उज़्बेक खतरे की अनदेखी कर रहे थे।

बाबर ने अपने चाचा से समरक़न्द छीनने का प्रयास किया। उसने दो बार इस नगर पर अधिकार किया, परन्तु दोनों बार उसे शीघ्र ही नगर छोड़ना पड़ा। दूसरी बार उज़्बेक शासक शैवानी ख़ान को समरक़न्द से बाबर को निकालने के लिए आमंत्रित किया गया। शैवानी ख़ान ने बाबर को पराजित किया…

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