Shrimadbhagwatgeeta
Religious

Shrimadbhagwatgeeta

रचनाकार / By: gita press gorakhpur
P प्रस्तोता: Preeti Yadav
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65 reads
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1295 पृष्ठ

EDITION & METADATA (ग्रंथ विवरण)

Language (भाषा)
Hindi
Category (श्रेणी)
Religious
Total Pages (कुल पृष्ठ)
1295
Author (लेखक / रचयिता)
gita press gorakhpur
Rights & Access (अधिकार)
Public Domain

यह पुस्तक संस्थागत डिजिटल आर्काइव में संरक्षित है।

Access at Primary Source

About the Book (पुस्तक परिचय)

विश्व-साहित्यमें श्रीमद्भगवद्‌गीताका अद्वितीय स्थान है। यह साक्षात् भगवान्‌के श्रीमुखसे निःसृत परम रहस्यमयी दिव्य वाणी है। इसमें स्वयं भगवान्ने अर्जुनको निमित्त बनाकर मनुष्यमात्रके कल्याणके लिये उपदेश दिया है। इस छोटे-से ग्रन्थमें भगवान्ने अपने हृदयके बहुत ही विलक्षण भाव भर दिये हैं, जिनका आजतक कोई पार नहीं पा सका और न पा ही सकता है।

हमारे परमश्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराजने इस अगाध गीतार्णवमें गहरे उतरकर अनेक गुहातम अमूल्य रत्न ढूंढ़ निकाले हैं, जिन्हें उन्होंने इस 'साधक संजीवनी' हिन्दी टीकाके माध्यमसे साधकोंके कल्याणार्थ उदारहृदयसे वितरित किया है। गीताकी यह टीका हमें अपनी धारणासे दूसरी टीकाओंकी अपेक्षा बहुत विलक्षण प्रतीत होती है। हमारा गीताकी दूसरी सब टीकाओंका इतना अध्ययन नहीं है, फिर भी इस टीकामें हमें अनेक श्लोकोंके भाव नये और विलक्षण लगे; जैसे पहले अध्यायका दसवाँ, उन्नीसवाँ-बीसवाँ और पचीसवाँ श्लोक; दूसरे अध्यायका उनतालीसवाँ-चालीसवाँ श्लोक; तीसरे अध्यायका तीसरा, दसवाँ, बारहवाँ तेरहवाँ और तैंतालीसवाँ श्लोक; चौथे अध्यायका अठारहवाँ और अड़तीसर्वां श्लोक; पाँचवें अध्यायका तेरहवाँ चौदहवाँ श्लोक; छठे अध्यायका बीसवाँ और अड़तीसवाँ श्लोक; सातवें अध्यायका पाँचवाँ और उन्नीसवाँ श्लोक; आठवें अध्यायका छठा श्लोक; नवें अध्यायका तीसरा और इकतीसवाँ श्लोक; दसवें अध्यायका इकतालीसवाँ श्लोक; ग्यारहवें अध्यायका छब्बीसवाँ-सत्ताईसवाँ और पैंतालीसवाँ छियालीसवाँ श्लोक; बारहवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक; तेरहवें अध्यायका पहला और उन्नीसवाँ-बीसवाँ इक्कीसवाँ श्लोक; चौदहवें अध्यायका तीसरा, बारहवाँ, सत्रहवाँ और बाईसवाँ श्लोक; पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ और ग्यारहवाँ श्लोक; सोलहवें अध्यायका पाँचवाँ और बीसवाँ श्लोक; सत्रहवें अध्यायका सातवाँ, आठवाँ, नवीं, दसवाँ श्लोक; अठारहवें अध्यायका सैंतीसवा और तिहत्तरवाँ श्लोक आदि-आदि। अगर पाठक गम्भीर अध्ययन करें तो उसे और भी कई श्लोकोंमें आंशिक नये-नये भाव मिल सकते हैं।

वर्तमान समयमें साधनका तत्त्व सरलतापूर्वक बतानेवाले ग्रन्थोंका प्रायः अभाव-सा दीखता है, जिससे साधकोंको सही मार्ग दर्शनके बिना बहुत कठिनाई होती है। ऐसी स्थितिमें परमात्मप्राप्तिके अनेक सरल उपायोंसे युक्त, साधकोपयोगी अनेक विशेष और मार्मिक बातोंसे अलंकृत तथा बहुत ही सरल एवं सुबोध भाषा-शैलीमें लिखित प्रस्तुत ग्रन्थका प्रकाशन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।

परमश्रद्धेय स्वामीजीने गीताकी यह टीका किसी दार्शनिक विचारकी दृष्टिसे अथवा अपनी विद्वत्ताका प्रदर्शन करनेके लिये नहीं लिखी है, अपितु साधकोंका हित कैसे हो- इसी दृष्टिसे लिखी है। परमशान्तिकी प्राप्ति चाहनेवाले प्रत्येक साधकके लिये, चाहे वह किसी भी देश, वेश, भाषा, मत, सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो, यह टीका संजीवनी बूटीके समान है। इस टीकाका अध्ययन करनेसे हिन्दू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई, मुसलमान आदि सभी धर्मोके अनुयायियोंको अपने-अपने मतके अनुसार ही उद्धारके उपाय मिल जायेंगे। इस टीकामें साधकोंको अपने उद्देश्यकी सिद्धिके लिये पूरी सामग्री मिलेगी।

परमशान्तिकी प्राप्तिके इच्छुक सभी भाई-बहनोंसे विनम्र निवेदन है कि वे इस ग्रन्थ-रत्नको अवश्य ही मनोयोगपूर्वक पढ़ें, समझें और यथासाध्य आचरणमें लानेका प्रयत्न करें।
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