| Author | Dr. Anil Modi |
| Genre | Ayurveda Books |
| Language | Hindi |
| Pages | 189 |
| File Size | 52 |
Book Summary
“मनचाही सन्तान पुत्र या पुत्री (मन्त्र, मणि एवं औषधि प्रयोग)” : “डॉ. अनिल मोदी” की यह पुस्तक उन लोगों के लिए एक विशेष मार्गदर्शक है जो अपने जीवन में संतान की प्राप्ति के लिए प्राकृतिक और प्राचीन उपायों की खोज में हैं।
इस पुस्तक में मंत्र, जादुई मणि और औषधियों के प्रभावी प्रयोग को सरल भाषा में समझाया गया है ताकि कोई भी व्यक्ति इन्हें आसानी से अपना सके। यह पुस्तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ-साथ पारंपरिक ज्ञान को भी आधार बनाकर बनाई गई है, जिससे इसका उपयोग भरोसेमंद और परिणामस्वरूप प्रभावशाली होता है।
यह पुस्तक सिर्फ संतान प्राप्ति के लिए ही नहीं, बल्कि परिवार और जीवन में सुख-समृद्धि लाने के लिए भी कई उपयोगी टिप्स और सुझाव प्रदान करती है। इसे पढ़कर पाठक एक व्यापक और गहन समझ हासिल कर सकते हैं जो उनके जीवन को सकारात्मक दिशा में बदल सकता है।
यह किताब उन लोगों के लिए है जो अपनी इच्छानुसार पुत्र या पुत्री प्राप्ति के लिए सही और नैसर्गिक रास्ता ढूंढ़ रहे हैं। इसे प्राचीन और आधुनिक दोनों ही दृष्टिकोणों से लिखा गया है, जिससे यह आज के समय में भी अत्यंत प्रासंगिक और उपयोगी बना रहता है।
Additional Information
भारतवर्ष में जनसंख्या वृद्धि का मुख्य कारण यह है कि प्रत्येक व्यक्ति एक लड़का एवं एक लड़की पैदा करना चाहता है। सामान्य व्यक्ति की इस कामना को राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार की कोई भी नीतियाँ लागू कर दें, कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला है।
मेरे विचार में, आज तक विभिन्न राज्य सरकारों एवं केन्द्र सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए सख्ती तो की है, लेकिन ऐसा कभी नहीं सोचा कि प्रत्येक व्यक्ति को “एक पुत्र और एक पुत्री” पैदा करने की शिक्षा को अनिवार्य विषय बनाकर जनसंख्या नियंत्रण किया जाए।
अपने शिशु का लिंग निर्धारण स्वयं करने की इच्छा रखने वाले माता-पिता के लिए यह पुस्तक आपके समक्ष प्रस्तुत करते हुए मुझे अत्यंत हर्ष हो रहा है, जिससे जनसामान्य लाभ उठा सकेगा।
इस पुस्तक में बताए गए नियमों का पालन करके आप अपनी इच्छा अनुरूप पुत्र या पुत्री ही उत्पन्न कर सकते हैं। जिनके संतान नहीं है, मासिक धर्म बंद हो गया है, या उम्र अधिक हो गई है, वे भी हिमालयी जड़ी-बूटियों से संतान उत्पन्न कर सकते हैं। मनचाही संतान ही होने से वे राष्ट्र और देश जो जनसंख्या नियंत्रण करना चाहते हैं, उनके लिए यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
प्रस्तुत पुस्तक में किसी भी दंपत्ति को पुत्र या पुत्री ही मनचाहे अनुसार पैदा करने की जो विधि बताई गई है, वह अत्यंत सरल, पूर्णतः प्राकृतिक, सात्विक, अनाक्रामक तथा नैतिक रूप से स्वीकार्य और वैज्ञानिक दृष्टि से पूर्णतः सुरक्षित है।
अपने शिशु का स्वयं लिंग निर्धारण करने के इच्छुक दंपत्तियों को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए तथा इस विषय से संबंधित व्यक्तियों को भी इसका अधिकाधिक प्रचार करना चाहिए। जनसंख्या नीति निर्धारकों को भी जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगाने की दृष्टि से इसे एक साधन के रूप में अपनाना चाहिए।
मैं अपने गुरुदेव के आशीर्वाद से पाठकों को यह संदेश देना चाहूँगा कि वे इसमें दी गई बातों को अपनाएँ और जीवन में मनचाही संतान प्राप्त करें। आप अपने उद्देश्य में सफल हों, इसी आशा से मंगलकामना करता हूँ।
लेखक की ओर से पाठकों का आह्वान
दंपत्तियों द्वारा दो बच्चों के परिवार का चुनाव न करने के पीछे यह मानसिकता रही है कि उनके दोनों बच्चे एक ही लिंग के हैं, और वे कम-से-कम एक बच्चा विपरीत लिंग का चाहते हैं — या कम से कम एक लड़का तो अवश्य ही चाहते हैं।
यदि वे बच्चे के लिंग का चुनाव पहले ही करने में सक्षम हों, तो निश्चित रूप से प्रत्येक दंपत्ति एक लड़का एवं एक लड़की ही उत्पन्न करना चाहेगा। बस, इसी समस्या का समाधान इस पुस्तक में करने का प्रयास किया गया है।
मेरे पूज्य गुरुदेव श्री शैलेन्द्र शर्मा “हिमालय योगी”, जो 400 वर्ष की आयु में आज भी जीवित हैं, कहते हैं कि “मंत्र-मणि से भी औषधि प्रबल है।” हिमालयी जड़ी-बूटियों में इतना बल है कि यदि आप चाहें लड़का, तो लड़का — और यदि लड़की चाहें, तो लड़की होगी।
एक लड़का और एक लड़की प्रत्येक के हो जाएँ, उसके पश्चात परिवार नियोजन के उपायों को अपनाएँ। इससे अन्य बच्चों के जन्म पर नियंत्रण पाया जा सकता है। जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण पाने का इससे बेहतर और क्या उपाय हो सकता है कि एक सरल और प्राकृतिक पद्धति का प्रचार माता-पिता में किया जाए, जिसके द्वारा वे इच्छानुसार लिंग का चुनाव कर बच्चे पैदा करने में सक्षम हों।
भारत में भावनात्मक, आध्यात्मिक, सामाजिक और धार्मिक रूप से लड़कों का ही अधिक महत्व रहा है। भारत ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, चीन, नेपाल और अन्य कई देशों में भी लोग लड़कियों की अपेक्षा लड़कों को अधिक चाहते हैं। परिणामस्वरूप, लड़कियों का प्रतिशत घटा है और महिला अपराधों में वृद्धि हुई है।
भारत सरकार एवं विभिन्न राज्य सरकारों की दृष्टि में “दो बच्चे बस — कोई भी हों” का सिद्धांत है। चाहे दो पुत्रियाँ हों, सरकार कहती है कि बेटा-बेटी समान हैं। परन्तु यह विचारधारा केवल सैद्धांतिक है, क्योंकि सरकार ने चाहे कितने भी दंड निर्धारित कर दिए हों, व्यक्ति पुत्र की कामना किए बिना रह ही नहीं सकता।
विभिन्न समाजों की अवधारणाएँ:
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भारत सरकार या राज्य सरकारों की अवधारणा: दो बच्चे कोई भी हों।
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शहरी क्षेत्र के दंपत्तियों की अवधारणा: एक पुत्र, एक पुत्री — अथवा दो पुत्र हों तो परिवार नियोजन; परंतु यदि दोनों पुत्रियाँ हों, तो एक प्रयास और।
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ग्रामीण क्षेत्र के दंपत्तियों की अवधारणा: दो लड़के, एक लड़की — अथवा केवल दो लड़के, कोई लड़की नहीं।
ऐसी अवस्था में यह पुस्तक प्रत्येक दंपत्ति तक पहुँचना आवश्यक हो गया है, ताकि हमारे पावन राष्ट्र भारतवर्ष का कल्याण हो और प्रत्येक माता-पिता एक पुत्र एवं एक पुत्री के स्वामी बन सकें।
पुस्तक लेखन में पूज्य गुरुदेव के आशीर्वाद के साथ मेरी धर्मपत्नी श्रीमती रेखा मोदी (एम.एस.सी., बी.एड., पी.जी.डी.सी.ए.) ने सराहनीय सहयोग किया है। उन्होंने बताया कि जिस स्त्री के पुत्र नहीं होते, उसकी व्यथा को कोई पुरुष नहीं समझ सकता। ऐसे में यह पुस्तक उसके कुल का दीपक बन सकती है और हमें ढेरों आशीर्वाद मिलेंगे।
धर्मपत्नी की इसी प्रेरणा से यह पुस्तक अथक प्रयासों के पश्चात आपके कर-कमलों में प्रस्तुत है।
