| Author | Surendra Verma |
| Genre | Literature |
| Language | Hindi |
| Pages | 516 |
| File Size | 40 |
Book Summary
“मुझे चाँद चाहिए” एक प्रेरणादायक और भावनात्मक कृति है जो जीवन की जटिलताओं और मनुष्य की गहरी आकांक्षाओं को बयां करती है। सुरेन्द्र वर्मा की यह किताब सरल भाषा में लिखी गई है, जिससे हर पाठक इसे आसानी से समझ और महसूस कर सकता है।
यह पुस्तक जीवन के संघर्षों, उम्मीदों, और सपनों के बीच की कहानी को साझा करती है, जो पाठकों को अपने अंदर छिपी भावनाओं से जुड़ने का मौका देती है। इसमें लेखक की गहरी सोच और मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति मिलती है, जो इसे एक खास और यादगार बनाती है।
“मुझे चाँद चाहिए” उन सभी के लिए एक मार्गदर्शक है जो अपने जीवन में उजियारा और सकारात्मक बदलाव चाहते हैं। यह पुस्तक न केवल साहित्य प्रेमियों, बल्कि जीवन में नई ऊर्जा खोजने वालों के लिए भी मूल्यवान है।
Additional Information
अगर मिस दिव्या कत्याल उसके जीवन में न आतीं, तो वह या तो आत्महत्या कर चुकी होती या रू-रू करते चार-पाँच बच्चों को सँभालती, किसी क्लर्क की कर्कश, बासी-सी जीवन-संगिनी होती।
पिछले साल जब वर्षा इंटरमीडिएट में थी, तभी मिस कत्याल मिश्रीलाल डिग्री कॉलेज में आयी थीं — लखनऊ से। वे दोनों किस्म की अंग्रेज़ी पढ़ाती थीं — सामान्य और साहित्य। साथ ही वे जनाने छात्रावास की वार्डन भी थीं। गेट से अंदर घुसते ही चारों ओर उनका छोटा-सा सुंदर बंगला था। पोर्च में उनकी, उन्हीं जैसी नाज़ुक-सी, सुंदर कार खड़ी रहती थी।
मिस कत्याल ने मिश्रीलाल डिग्री कॉलेज के इतिहास में भाव पक्ष और कला पक्ष — दोनों दृष्टियों से नया, स्वर्णिम अध्याय जोड़ा था। वे खूब गोरी और आकर्षक थीं। कभी चूड़ीदार-कमीज़ पहनकर लावण्यमयी युवती बन जातीं, कभी लहराते पल्लू वाली साड़ी बाँधकर गरिमामय महिला। कभी बालों की दो चोटियाँ पीछे डोलतीं, कभी बड़ा-सा जूड़ा बन जाता। वेश कोई भी हो, लेकिन जैसे लक्ष्मी के साथ समृद्धि चलती है, वैसे ही अपने विषय का अधिकार उनके साथ-साथ चलता था। कॉलेज की वे अकेली अध्यापिका थीं, जिनके हाथों में नोट्स की कॉपी कभी नहीं देखी गयी।
मिस कत्याल जब कॉलेज के गलियारों में चलतीं, तो विद्यार्थी समुदाय की निगाहों से सम्मान की ‘रेड कार्पेट’ बिछती जाती।
संस्थापक-दिवस पर अब तक सेठ मिश्रीलाल की दानशीलता पर भाषण होते थे, जिसके प्रारंभ में यह कविता पढ़ी जाती थी —
“जीवन में मिश्री घोल गये तुम मिश्रीलाल पल्लरवाले,
जड़ता के फाटक खोल गये तुम ज्ञान-जड़ी झालरवाले…”
मिस कत्याल ने आते ही इस कार्यक्रम को ‘ध्रुवस्वामिनी’ के मंचन के रूप में मनाया — कॉलेज का यह पहला नाट्य प्रदर्शन था। शहर के मुख्य बाजार में ‘नारी सिंगार निकेतन’ के बाहर रखा पोस्टर उत्सुक आँखों की बंदनवार से शोभित होने लगा।
शहर, जो एक सलोनी युवती के कुशल कार-चालन से चौंका हुआ था, इस नाटक के प्रदर्शन से स्तब्ध रह गया। मिस कत्याल की प्रसिद्धि मिश्रीलाल डिग्री कॉलेज की सीमाएँ पार करके नगर को आलोड़ित करने लगी।
वर्षा वशिष्ठ के जीवन का यह बेहद संकटकालीन दौर था।
पिछले महीने से उसकी ब्रा का साइज और बढ़ गया था। उसके शरीर के अंगों के कटाव और मांसलता में तीखापन आने लगा था। दिन-ब-दिन बढ़ती यह देह की वसंत ऋतु उसके मन की ऋतु से कोई तालमेल नहीं बिठा पा रही थी। उसके मन में लगातार शोकगीत बजते रहते थे।
क्यों?
कुछ सवालों का डंक उसे हमेशा चुभता था —
वह क्यों पैदा हुई?
उसके जीवन का उद्देश्य क्या है?
क्या जीवन की प्रकृति वैसी ही होगी जैसी 54, सुल्तानगंज की है?
क्या उसे भी वैसा ही जीवन जीना होगा जैसा अम्माँ, दद्दा और जिज्जी का है?
अपने रक्त-संबंधियों के लिए उसके मन में जो भावनाएँ थीं, वे हमदर्दी, उदासीनता, करुणा और आक्रोश के बीच झूलती रहतीं। इन दिनों अंतिम जज़्बा — आक्रोश — उफान पर था।
किशनदास शर्मा प्राइमरी स्कूल में संस्कृत के अध्यापक थे। शहर के पुराने, निम्न-मध्यमवर्गीय इलाके में संकरी, ऊबड़-खाबड़ गलियों और खुली बदबूदार नालियों के बीच उनका पंद्रह रुपये महीना किराये का आधा कच्चा, आधा पक्का दो-मंज़िला मकान था।
बड़ा बेटा महादेव स्टेट रोडवेज में क्लर्क था। दो साल पहले उसका तबादला पीलीभीत हो गया था। बड़ी बेटी गायत्री माँ पर गई थी — गोरी और आकर्षक। पढ़ाई के नाम से उसे रुलाई आती थी, इसलिए इंटरमीडिएट के बाद उसने विवाह के शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा में घर सँभाल लिया।
इससे माँ को बहुत राहत मिली क्योंकि —
“जिंदगी भर कोल्हू में जुते रहने के बाद अब बचा-खुचा समय तो सीताराम सुमिरन में लगे।”
सबसे छोटी नौ वर्ष की गौरी उर्फ झल्ली थी। उसके ऊपर तेरह वर्ष का किशोर और बीचों-बीच की — साँवली, लम्बी-छरहरी, बड़ी-बड़ी आँखों वाली सिलबिल उर्फ यशोदा शर्मा।
अनुष्टुप के बिना 54, सुल्तानगंज का परिवेश अधूरा था। यह तोता तुलसी के चौरे के पास बरामदे की दीवार से लटका रहता था। यह हरा जीवधारी अपने नाम को सार्थक करते हुए मुँह अँधेरे से शुरू हो जाता था —
“झल्ली, सीताराम बोलो।”
“किशोर, गायत्री मंत्र पढ़ लिया?”
“सिलबिल, धीरे बोलो।”
सिलबिल के साथ अनुष्टुप का संबंध वैसा ही था, जैसा बाँधिन का हिरनी से होता है। जैसे ही सिलबिल सामने आती, अनुष्टुप की टोकाटाकी शुरू हो जाती —
“सिलबिल, तुलसी में पानी नहीं दिया?”
“सिलबिल, देर लगा दी?”
सिलबिल की पहली रणनीति अनुष्टुप को अपनी ओर मोड़ने की बनी। उसने उसे मीठा ग्राइपवाटर पिलाया, सर्दी में पिंजरा धूप में रखा, मिश्री की डली खिलाई। पर जब इस पर भी अनुष्टुप ने अपनी रट नहीं छोड़ी, तो उसने गोबरभरी हरी मिर्च पिंजरे की कटोरी में रख दी।
इस पर अनुष्टुप ने “सिलबिल कपटी है” की रट लगाकर माँ की डाँट की भूमिका बना दी।
सिलबिल का विचार था कि तोते का नाम “पृथ्वीभर क्षमा” होना चाहिए — क्योंकि उसका व्यवहार आरोप, क्रोध और धिक्कार के लिए सबसे उपयुक्त था। पिता की आलमारी से उसने महाकवि क्षेमेन्द्र की ‘सुवृत्त तिलक’ के पन्ने पलट लिये थे।
अनुष्टुप के संदर्भ में जो सिलबिल नहीं कर पाई, उसका खतरा अपने लिए उसने ज़रूर उठा लिया। हाईस्कूल का फॉर्म भरते समय — आत्मान्वेषण की लंबी यात्रा की शुरुआत में — सबसे पहले अपनी विरासत को नकारते हुए उसने अपना नाम बदल लिया —
वर्षा वशिष्ठ!
सिलबिल का घरेलू नामकरण तब हुआ था जब वह कुछ हफ्तों की थी। लगभग तीन-चार साल तक उसने अपने नाम की सार्थकता बनाये रखी। चलते समय उसकी चड्डी फिसलती रहती थी, फ्रॉक से नाक पोंछने में उसे कोई संकोच नहीं था, और कुछ गिराये बिना उसके लिए खाना-पीना मुश्किल था।
लेकिन पाँच की उम्र तक धीरे-धीरे सिलबिल ने अपने संबोधन को निरर्थक सिद्ध कर दिया। समय के साथ शर्माजी को यह एहसास हो गया कि यशोदा बाकी बच्चों से भिन्न है। वह एकांतप्रिय और चिंतनशील थी।
उन्होंने देखा था कि गहराती शाम में घर की छत पर चारपाई पर बैठी वह पुस्तक पढ़ रही होती या छुट्टी की दोपहर में सामने निहारती हुई कुछ सोचती रहती। घर में शुद्ध घी की अनुपस्थिति में वह बिना शिकायत के रूखी रोटी खा लेती थी।
त्योहार पर नए कपड़ों की ज़िद करते हुए भी वह शांत रहती। ऐसे अवसरों पर उसके चेहरे पर एक सख्ती आ जाती — जो आगे चलकर उसकी आँखों में स्थायी भाव बन गयी।
जब संध्या समय शर्माजी को बाजार में मिश्रीलाल इंटर कॉलेज के अध्यापक जनार्दन राय ने बताया कि सिलबिल ने अपना नाम बदल लिया है, तो वे कुछ पलों के लिए अवाक रह गए।
उन्होंने यह तो सुना था कि “फलानी लड़की घर से भाग गई” या “ढिकानी ने आत्महत्या कर ली”, पर ऐसा हादसा उनके लिए नया था। उनके वंश की सात पीढ़ियों के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ था।
जब शर्माजी घर पहुँचे, तो वे बहुत व्यथित थे। उन्होंने अपना छाता आँगन से लगे बरामदे में खूँटी पर टांगा, चप्पलें कोने में उतारीं, सफेद टोपी उतारकर दूसरी खूँटी पर लटकाई।
गायत्री रसोई में मसाला भून रही थी। माँ आँगन में बैठी लौकी काट रही थी। किशोर सीढ़ी पर बैठा अपने जूतों पर पॉलिश कर रहा था।
“दद्दा, चाय पियोगे?” — गायत्री ने रसोई के द्वार से पूछा।
इसका जवाब दिए बिना शर्माजी ने पूछा —
“सिलबिल घर में है क्या?”
गायत्री ने माँ की ओर देखकर कहा —
“ऊपर है।”
“सिलबिल…” — शर्माजी ने पुकार लगाई।
