| Author | Ambika Dutt Shastri |
| Genre | Education & Academics |
| Pages | 663 |
| File Size | 61 |
Book Summary
“सुश्रुत संहिता” आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान का एक प्रतिष्ठित ग्रंथ है, जिसमें प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति, शारीरिक संरचना, रोगों की पहचान एवं उपचार, शल्य चिकित्सा (सर्जरी) और स्वास्थ्य संरक्षण के गहन सिद्धांत दिए गए हैं। श्री अम्बिकादत्तशास्त्री आयुर्वेदाचार्य द्वारा प्रस्तुत यह पुस्तक सुश्रुत के अनुभव और शोध को आधुनिक संदर्भ में सरल और सहेज भाषा में प्रस्तुत करती है।
यह ग्रंथ हर आयुर्वेद के विद्यार्थी, चिकित्सक, शोधकर्ता और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक व्यक्ति के लिए अनमोल स्रोत बन गया है। इसमें शरीर विज्ञान, उपचार विधियां, औषधियों का उपयोग, रोगों का निदान और दैनिक जीवन के लिए स्वस्थ्य रहने के सुझाव विस्तार से दिए गए हैं।
“सुश्रुत संहिता” का उद्देश्य भारतीय चिकित्सा विज्ञान की समृद्ध परंपरा को पुनः उभारना और पाठकों को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की ओर मार्गदर्शन देना है। सुव्यवस्थित, प्रमाणिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ यह पुस्तक आज के समय में भी प्रभावी और प्रासंगिक है।
Additional Information
विश्व के विद्वानों ने एकमत से स्वीकार किया है कि वेद सबसे प्राचीन ग्रन्थ हैं तथा उनमें रोग, जीवाणु, औषधियाँ और मन्त्रों का वर्णन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। अतः चरक, सुश्रुत प्रवृत्ति आचार्यों ने आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपांग माना है —
‘इह खल्वायुर्वेदो नामोपाङ्ग मथर्ववेदस्यानुत्पाद्यैव प्रजाः श्लोकशतसहस्रमध्यायसहस्रय्व कृतवान् स्वयम्भूः’ (हु. सू. अ १),
‘चतुर्णामृक्सामयजुरथर्ववेदानामथर्ववेदे भक्तिरादेश्या’ (च.सू.अ. ३०)।
यद्यपि आयुर्वेद मानव सृष्टि के प्रारम्भ से ही प्रादुर्भूत हुआ माना जाता है, किन्तु यूरोपीय इतिहासकारों ने आज से तीन-चार हजार वर्ष पूर्व भारत के भीतर चिकित्साशास्त्र उन्नत था ऐसा स्वीकार किया है क्योंकि उनके पास यहाँ के प्राचीन ऐतिहासिक तत्त्व उपलब्ध नहीं थे। किंतु जो अनुसन्धान हुए हैं, उनसे भारतीय संस्कृति की प्राचीनता मानी हुई परिधि से भी अधिक पुरातन सिद्ध हो रही है। मोहनजोदड़ो की खुदाई ने पाश्चात्य ऐतिहासिक पণ্ডितों का मत परिवर्तन कर दिया है। अन्य भी शोध हो रहे हैं जिनसे प्राचीन भारत का गौरव विशेषतः प्रकाशित होने की संभावना है। भारत से ही यह विद्या यूनान और यूरोप आदि पाश्चात्य देशों में प्रसारित हुई — यह भी ऐतिहासिक तथ्य है।
आयुर्वेद पूर्व में एक लक्ष् श्लोकों में था किन्तु बाद में चरक, सुश्रुतादि आचार्यों ने इसे अनेक अंगों या अष्टांगों में विभक्त किया। आयुर्वेद पर कहा गया है —
‘आयुर्वेदः श्लोकलेखेन पूर्व ब्राह्मास्त्वासीदग्निवेशादयस्तु । कृच्छाब्ज्ञेयप्राप्तपाराः सुतन्त्रास्तस्यैकैकं नैकधा-ऽङ्गानि तेनुः । ।’
इसके अनन्तर आयुर्वेद का क्रमशः विकास हुआ और महर्षि धन्वन्तरि ने मानसशुद्धि, शब्दशुद्धि तथा शरीरशुद्धि के ऊपर विशेष अनुसन्धान करके यह तथ्य स्थापित किया कि जब तक मानसिक, शब्दिक तथा शारीरिक शुद्धि न हो तब तक मानव समाज का यथार्थ स्वास्थ्य-रक्षण सम्भव नहीं है। अतः उन्होंने मानसशुद्धि के लिये योग-शास्त्र का प्रचार किया, शब्दशुद्धि के लिये पाताल महाभाष्य बनाया तथा शरीरशुद्धि के लिये आयुर्वेद शास्त्र का विशेष प्रचार किया। जैसा कि कैटने पाताल महाभाष्य की टीका के मंगलाचरण में लिखा है —
‘योगेन चित्तस्य पादन वाचां मलं शरीरस्य तु वैद्यकेन । योऽपाकरोन्तं प्रवरं मुनीनां पतञ्जलि प्राञ्जलिरानतोऽस्मि ।’
प्राचीनकाल में इन अष्टांगों के पृथक्-पृथक अनेक तंत्र थे किन्तु समय के प्रभाव से उन तंत्रों का नाम-शेष रह गया है। उन तंत्रों में चरक द्वारा प्रतिसंस्कृत तथा काय-चिकित्सा प्रधान अग्निवेश तन्त्र (चरकसंहिता) एवं शल्य-चिकित्सा प्रधान सुश्रुततन्त्र ही पूर्ण रूप से प्राप्य हैं। यद्यपि मेलतन्त्र तथा वृद्धजीवकीय तन्त्र (काश्यपसंहिता) भी पूज्य आचार्य की कृपा से प्रकाशित हो गये हैं, किन्तु वे भी अनेक स्थलों में खण्डित होते हुए भी प्राच्य गौरव के महत्त्वपूर्ण प्रदर्शक हैं। काय-चिकित्सार्थ चरक तथा शल्य-चिकित्सार्थ सुश्रुत का अध्ययन प्राचीनकाल से प्रचलित था, जैसा कि बाग्भट ने भी लिखा है —
‘ऋषि-प्रणीते प्रीतिश्वेन्मुक्त्वा चरकसुश्रुतौ ।
भेषजा याः किं न पठ्यन्ते तस्मात् ग्राह्यं सुबाषितम् ।’
श्रीहर्ष कवि के समय में भी चरक-सुश्रुत को पढ़े हुए वैद्य ही श्रेष्ठ माने जाते थे —
‘कन्यान्तःपुरबाधनाय यद्धीकारान्न दोषा नृपं द्वौ मन्त्रिप्रवरश्च तुल्यमगदङ्कारश्च तावू चतुः । देवाकर्णय सुश्रुतेन चरकस्योक्तेन जानेऽखिलं स्यादस्या नलदं बिना न दलने तापस्य कोऽपि तमः ।।’ (नै.च.सर्ग ४)
बाग्भट के समय तक यह माना जाता था कि यदि केवल चरक का अध्ययन किया जाय तो सुश्रुत में आयी बीमारियों का ज्ञान नाम मात्र होगा तथा यदि केवल सुश्रुत का अध्ययन किया जाय तो रोगों के प्रतीकार की प्रक्रिया का ज्ञान असम्भव है। अतः चरक तथा सुश्रुत दोनों का अध्ययन आवश्यक माना गया।
नोट: आचार्य यादगजी सम्पादित काश्यपसंहिता का द्वितीय संस्करण प्रतीततः हाल में प्रकाशित हुआ है (चौखम्बा संस्कृत सौरभ, बनारस)।
यदि चरक-माध्ये तद् ध्रुवं सुश्रुतादि-प्रणीत ग्रन्थों के नाममात्रेऽपि बाह्यः। अथ चरक-विहीनः प्रक्रियायामखिन्नः किमिव खलु करोतु व्याधितानां उपचारः।
इस प्रकार मध्यकाल में इन्हें अपने-अपने विषयों में श्रेष्ठ माना जाता रहा है।
हजार वर्ष पूर्व के ‘ज्वरसमुच्चय’ नामक अन्य ग्रन्थ में भी चरक तथा सुश्रुत के यहुत (संदर्भ) दिये हुए हैं। इसी प्रकार चतुर्थ शताब्दी के ‘नावनीतक’ नामक पुस्तक में चरक तथा सुश्रुत का उल्लेख है। बाणभट्ट के चरित्र में पौरवसम (पौरव के पुत्र या शिष्य) वैदिकुमार के निर्देश से आत्रेय पुनर्वन्तु के सम्प्रदाय का उस समय भी प्रचार विदित होता है। इस प्रकार चरक से सुश्रुत संहिता का उद्भव हुआ और अपनी गुणता तथा महिमा के कारण भारतीय तथा विदेशों में भी ये अत्यन्त प्रचलित रहीं तथा आज भी अन्य वैद्यों के लिये सर्वस्व मानी जाती हैं।
सप्तम, अष्टम तथा नवम शताब्दी में, जब अरब एवं पारसियों का वेश अत्यन्त प्रतिष्ठित था, उस समय भारतीय चिकित्सा विज्ञान के आदर के कारण चरक तथा सुश्रुत संहिताओं का अनुवाद हुआ। अरबों में चरक ‘सरफ’ नाम से तथा सुश्रुत ‘ससद’ नाम से प्रसिद्ध हुए। अल्बेरूनी के अनुसार उसके पुस्तकालय में चरक का अनुवाद था। अलमानपुर (Almansur — ई. सन् ७५३-७४) ने कई आयुर्वेदिक ग्रन्थों, चरक के शल्य-चिकित्सा प्रकरण तथा सुश्रुत का अनुवाद किया था। रेजेस् (Rhages) नामक उसका वैद्य चरक का बहुत सम्मान करता था। कुछ पाश्चात्य विद्वान भी भारतीय आयुर्वेद तथा चरक-सुश्रुत को जानते थे।
अशोक राजा के समय बौद्ध धर्म के साथ भारतीय आयुर्वेद भी सिंहद्वीप (श्रीलंका) में पहुँचा था। भारतीय आयुर्वेद विशेषकर बाग्भट की टीकाओं के द्वारा तिब्बत में पहुँचकर वहाँ से मंगोल तक फैल गया। भारत में विलुप्त हुई बहुत-सी बाग्भट की टीकाएँ आज तिब्बत में अनूदित रूप में मिलती हैं।
चरक-सुश्रुत संहिताओं में सुश्रुतसहिता पढ़ाने की प्रतिपादकता का विशेष महत्त्व है। चरक ने न केवल काय-चिकित्सा को प्रतिष्ठित किया बल्कि स्वयं चरकाचार्य ने शल्य-शास्त्र में धन्वन्तरि सम्प्रदाय का महत्व स्वीकार किया है —
‘अत्र धन्यन्वरीयाणामधिकारः क्रियाविधौ । पराधिकारे तु न विस्तरोक्तिः ॥’ (च.चि. अ. २६)
इस सत्यप्रधान तन्त्र को काशिराज अर्थात् धन्वन्तरि ने सुश्रुतादि शिष्यों को उपदिष्ट किया तथा सुश्रुत ने सुश्रुत संहिता रची — यह बात संहिता के श्लोकों से स्पष्ट होती है —
‘अथ खलु भगवन्तममरवरसृषिगणपरिवृतमात्रमस्थं काशिरानं दिवोदासं धन्वन्तरिमौ पचेनववैतरणौर-अपि श्रेष्ठकलावतकरवीर्यगोपुररक्षिवसुश्रुत प्रभृतय। ऊचुः’ (सु. सू. अ. ०१)
‘अहं हि धन्वन्तरिरादिदेवो जरारुनामृत्युहरोऽमराणाम् । शल्यैणभैरपरैरुपेतः प्राप्तोऽस्मि गां भूय इहोपदेष्टुम् ।।’
‘धन्वन्तरि धर्मभृतां वरिष्ठममृतोद्भवम् । चरणावुपसंगृह्य सुश्रतः परिपृच्छति ।।’ (सु.नि. अ.०१)
आष्टाङ्गवेदविद्वांसं दियोदासं महौजसम् —
‘विश्वामित्रसुतः श्रीमान् सुश्रुतः परिपृच्छति ।।’ (०४० २०६२)
धन्वन्तरि-परिचय (संक्षेप)
वेदों में वैद्याचार्य धन्वन्तरि का कहीं भी प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं मिलता। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में दिवोदास नामक एक शासक का उल्लेख मिलता है। इस वैदिक दिवोदास का काशिराज होना तथा धन्वन्तरि के साथ सम्बन्ध का प्रमाणित होना स्पष्ट नहीं है। परन्तु महापुराणों (विष्णु-पुराण, भागवत, ब्रह्माण्ड पुराण आदि) में समुद्र मन्थन के समय भगवान् विष्णु द्वारा धन्वन्तरि का अवतरण कथित है — जिसमें वे आयुर्वेद के प्रवर्तक माने गए हैं। उदाहरणार्थ महाभारत, भागवत पुराण आदि में धन्वन्तरि का वर्णन मिलता है —
‘धन्वन्तरिस्ततो देवो बभूव… श्वेतं कमण्डलु बिभ्रद्…’ (उद्धरण सूक्ष्म रूप में)
धन्वन्तरि-वर्णन विभिन्न पुराणों में मिलता है और कहा गया है कि वे विष्णु के अवतार हैं तथा अमृत कलश के साथ प्रकट हुए। कई पुराणों में धन्वन्तरि का स्वागत, उनके वंश, तथा उनके अनुयायियों के विषय चर्चा पाई जाती है। कुछ पुराणों में कहा गया है कि धन्वन्तरि का जन्म कशि-राज की वंशावली में हुआ।
ऐतिहासिक दृष्टि से कुछ विद्वानों ने महाभारत का समय ईसा-पूर्व १००० वर्ष तथा सुश्रुत का समय ईसा-पूर्व २००० वर्ष माना है; अतः धन्वन्तरि का समय ईसा-पूर्व २००० के आसपास माना जा सकता है।
धन्वन्तरि-शिष्यपरम्परा
धन्वन्तरि के शिष्यों में भरद्वाज के अग्निवेश मेल, जतुकर्ण, पाराशर प्रवृत्ति, तथा अन्य अनेक शिष्य परम्पराएँ उल्लेखनीय हैं। भगवान् धन्वन्तरि के पास अध्ययनार्थ अनेक विद्वान आए और उन्होंने आयुर्वेदोपदेश ग्रहण किया —
‘भगवन्! शारीरमनसागन्तुव्याधिभिविविध… तेषां सुखैषिणां रोगोपशमनार्थम् आयुर्वेदं श्रोतुमिच्छाम इहोपदिश्यमानम्’ (मु. सू. अ. १)
धन्वन्तरि ने उनका स्वागत किया और पढ़ाने का आश्वासन दिया —
‘तानुवाच भगवान् स्वागतं वः, शृणु एव अमीमांस्या अध्याप्याश्च भवन्तो वत्साः’ (०० अ०१)
इसके अनन्तर, उन शिष्यों में प्रमुख सुश्रुत ने भगवान् धन्वन्तरि से आयुर्वेद का श्रवण करके उस ज्ञान को संहिता के रूप में संकलित किया जिसे सुश्रुतसंहिता कहते हैं।
सुश्रुत-परिचय (संक्षेप)
सुश्रुत-सहिता के विभिन्न स्थानों के प्रमाण बताते हैं कि सुश्रुत का नाम विश्वामित्र के पुत्र के रूप में मिलता है — अर्थात् ‘विश्वामित्रसुतः श्रीमान् सुश्रुतः परिपृच्छति’ — कई टीकाओं में भी यही उल्लेख मिलता है। कुछ टीकाओं में यह भी कहा गया है कि विश्वामित्र ने अपने पुत्र सुश्रुत को धन्वन्तरि के पास अध्ययनार्थ भेजा था —
‘विश्वामित्रो मुनिस्तेषु पुत्रं सुश्रुतमुक्तवान् । bats: वाराणसीं गच्छ त्वं विश्वेश्वरवल्लभाम् ।’ (उद्धरण संक्षेप)
महाभारत के अनुशासन पर्व में विश्वामित्र के पुत्रों में सुश्रुत का नामोल्लेख मिलता है। भाषाप्रकाश में भी विश्वामित्र के उद्धृत कथ्य मिलते हैं जिनके अनुसार सुश्रुत को धन्वन्तरि से आयुर्वेद का उपदेश प्राप्त हुआ। सुश्रुतसंहिता में भी कतिपय स्थलों पर कृष्ण का नाम लेने के प्रमाण मिलते हैं, जिससे सुश्रुत की पारिवारिक पृष्ठभूमि तथा कालखंड पर कुछ संकेत मिलते हैं।
इस प्रकार विश्वामित्र की वंशपरम्परा तथा उनकी ज्ञानदृष्टि से यह कथ्य प्रकट होता है कि सुश्रुत ने धन्वन्तरि से आयुर्वेद का अध्ययन किया तथा शल्यप्रधान आयुर्वेद तन्त्र का स्रष्टा माना गया।
समापन-सूत्र
उक्त प्राक्कथन में प्रस्तुत तथ्य और उद्धरण प्राचीन ग्रन्थों, टीकाओं तथा पुराणिक कथाओं के संदर्भ में संकलित हैं। आयुर्वेद का इतिहास, उसके स्रोत, धन्वन्तरि की कथाएँ तथा चरक—सुश्रुत परम्पराओं का वर्णन दर्शाता है कि भारतीय चिकित्सा विज्ञान न केवल प्राचीन है, अपितु इसका प्रभाव तथा प्रसार विदेशों तक रहा — और समय-समय पर विभिन्न टीकाओं और व्याख्याओं के माध्यम से इसका विकास तथा संरक्षण होता रहा है।