Hindi Muhavra Kosh : Dr. Bholanath Tiwari | हिन्दी मुहावरा कोश : डॉ भोलानाथ तिवारी

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Hindi Muhavra Kosh
AuthorDr. Bholanath Tiwari
GenreEducation & Academics
LanguageHindi
Pages480
File Size26
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Book Summary

“हिन्दी मुहावरा कोश” एक अत्यंत उपयोगी और समृद्ध पुस्तक है, जिसे डॉ भोलानाथ तिवारी ने हिंदी भाषा के विद्यार्थियों, अध्यापकों और साहित्य प्रेमियों के लिए तैयार किया है। इस किताब में हिंदी भाषा के लोकप्रिय, प्राचीन और आधुनिक मुहावरों का संग्रह प्रस्तुत किया गया है, जिनका अर्थ, प्रयोग और संदर्भ सरल शब्दों में समझाए गए हैं।

यह कोश न केवल भाषा की गहराई और सुंदरता को उजागर करता है, बल्कि पाठकों को हिंदी बोलचाल और लेखन में सटीकता और प्रभावशाली अभिव्यक्ति का ज्ञान भी देता है। टीचर्स, स्टूडेंट्स, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वालों और हिंदी के लेखक सभी के लिए यह एक संदर्भ पुस्तक के तौर पर अनमोल साधन है।

पुस्तक का उद्देश्य है कि हिंदी के मुहावरों की विविधता, उनका सही अर्थ और रोचकता हर पाठक तक पहुंचे ताकि भाषा को बेहतर बनाया जा सके। सरल भाषा, रोचक उदाहरण और व्यावहारिक उपयोग के साथ यह किताब हिंदी भाषा और संस्कृति को सीखने और समझने का सबसे अच्छा माध्यम है।

Additional Information

‘मुहावरा’ और हिन्दी में उसकी परम्परा

‘मुहावरा’ शब्द

‘मुहावरा’ शब्द मूलतः अरबी भाषा से लिया गया है। इसकी धातु हे-वाव-रे मानी गई है, जिसका अर्थ है ‘बात करना’ अथवा ‘उत्तर देना’। इसी से हावर शब्द बना, जिसका अर्थ है ‘बातचीत करना’, ‘प्रकटीकरण करना’ या ‘प्रत्युत्तर देना’। अरबी में इसका क्रियात्मक रूप ‘मुहावरत’ है, जिसका फ़ारसी रूप ‘मुहावर’ बनता है और हिन्दी में यह ‘मुहावरा’ के रूप में आया। उर्दू में भी इसे समान शब्द के रूप में लिखा और बोला जाता है।

संस्कृत में मुहावरों का प्रयोग मिलता है, परन्तु उसके लिए कोई अलग, स्वीकृत नाम सामान्यत: उपलब्ध नहीं है। कुछ विद्वान ‘वाग्रीति’, ‘बान्धारा’, ‘वाग्वृत्ति’, ‘भाषा-संप्रदाय’ आदि शब्द प्रस्तावित करते हैं; ये नवार्थी शब्द प्रतीत होते हैं और परम्परागत संस्कृत साहित्य में इनका उपयोग व्याप्त नहीं मिला। काव्यशास्त्र की परंपरा में मुहावरे लक्षणा (विशेषता/रूढ़ अभिव्यक्ति) के अन्तर्गत माने जाते हैं—प्रारम्भ में प्रयोजनवती लक्षणा के रूप में जन्म लेते हैं और समय के साथ सदा-लक्षणा बन जाते हैं।


मुहावरों का जन्म

साधारण भाषा अपना सामान्य वाच्यार्थ ही प्रकट करती है। परन्तु जब वक्ता/लेखक को लगता है कि सामान्य शब्दावली उसकी अपेक्षित भाव-व्यक्ति को पर्याप्त रूप से अभिव्यक्त नहीं कर पाती, तो वह सामान्य प्रयोग से विचलित होकर नवीन रूपों (सादृश्य, रूपक, हाव-भाव आदि) का सहारा लेता है। इसी विचलन से नए मुहावरे जन्म लेते हैं। यह जन्म सामान्य बातचीत में भी संभव है और काव्यभाषा में भी। नए मुहावरे अक्सर संक्षेप में गहरा अर्थ और अभिव्यंजक चुभन दे देते हैं।


मुहावरों के जन्म के आधार

मुहावरे अनेक आधारों पर बनते हैं; प्रमुख आधार नीचे दिये जा रहे हैं—

(क) सादृश्य (रूपक) के आधार पर

सबसे अधिक मुहावरे सादृश्य पर आधारित होते हैं—किसी वस्तु/अवस्था की तुलना किसी परिचित दृश्य/कृया से कर के बनाया जाता है। उदाहरण:

  • गागर में सागर भरना

  • सातवें आसमान पर होना

  • दाँत निपीटना / दाँतों तले उंगली दबाना (गुस्सा/कठोरता)

  • किरकिरा कर देना

  • तिनका तक न बचना (संपूर्ण विनाश/नष्‍ट)

  • सोने पर सुहागा होना

(ख) प्रतीकात्मक (सिंबॉलिक) आधार

कुछ शब्द/वस्तुओं को प्रतीक मानकर मुहावरे बनते हैं—विशेष स्थान, पद या वस्तु किसी गुण/स्थिति की प्रतीक बन जाती है। उदाहरण:

  • किसी की ‘दाई’ का प्रयोग प्रतीक के रूप में होना

  • ‘दीन-दिन’ आदि

(ग) मुद्रा/हाव-भाव के आधार पर

विशेष शारीरिक मुद्रा या हाव-भाव से जुड़े मुहावरे—जैसे सिर हिलाना, बाँह पार करना, इत्यादि।

(घ) शारीरिक/अवस्था वर्णन के आधार पर

भूख, थकान, बेचैनी आदि शारीरिक अवस्थाओं का वर्णन करके मुहावरे बनते हैं—उदाहरण:

  • पेट में चूहे कूदना

  • अन्दरूनी अंगों का कुमकुमाना (अंतड़ियाँ कुलबुलाना)

  • अंतड़ियों में जाम लगना

(ङ) गुण-अवगुण के संकेत पर

किसी विशिष्ट गुण या अवगुण के कारण बने मुहावरे—जैसे बलहीनता, अकार्यक्षमता आदि को सूचित करने वाले मुहावरे।

(च) ऐतिहासिक आधार पर

ऐतिहासिक घटनाओं या प्रसिद्ध कथाओं से प्रेरित मुहावरे—जैसे किसी ऐतिहासिक प्रसंग पर आधारित लोकोक्तियाँ।

(छ) कल्पित/अतिशयोक्तिपूर्ण स्थिति के आधार पर

असाधारण या सम्भव-पर्याप्त कल्पनाओं पर बने मुहावरे—जैसे आसमान के तारे तोड़ना, जान हथेली पर रखना इत्यादि।


मुहावरों की विशेषताएँ

मुहावरों की कुछ सामान्य विशेषताएँ निम्नानुसार हैं—

  1. बोलचाल की भाषा में सामान्यतः प्रयुक्त होते हैं।

  2. मुहावरा एक ध्वनि-इकाई/वाक्य-इकाई होता है, जिसमें प्रायः बहु-शब्द समाहित होते हैं।

  3. प्रकृति में लक्ष्यार्थात्मक होते हैं—अर्थात् शब्दों का प्रयोग लक्ष्यार्थ (रूढ़ अर्थ) के लिए होता है न कि कोशार्थ (शब्दकोशीय) अर्थ के रूप में।

  4. शब्दों का लचीलापन सीमित होता है—अक्सर शब्दों को आपस में बदलकर नहीं कहा जा सकता (उदाहरण: ‘पानी-पानी होना’ को ‘जल-जल होना’ नहीं कहा जा सकता)।

  5. वाक्य में वे अभिन्न अंग बन जाते हैं और अलग से नहीं खड़े रहते (लोकोक्ति-सदृश समेकितता)।

  6. एक भाषा से दूसरी भाषा में उनका शाब्दिक अनुवाद कठिन होता है। उदाहरण: अंग्रेज़ी idiom to pay back in the same coin का हिन्दी में सटीक अनुवाद कठिन है; यहाँ ‘ईंट का जवाब पत्थर से देना’ जैसी लोकोक्तियाँ श्रेयस्कर होती हैं।

परिभाषा (संक्षेप):
मुहावरा वह भाषा-विशेष अभिव्यक्ति है, जो प्रत्यक्षार्थ से अलग रूढ़ अर्थ (लक्ष्यार्थ) में प्रयुक्त होती है और समेकित, पारस्परिक अर्थप्रकाश देती है।


मुहावरों का वर्गीकरण

वर्गीकरण कई मानदण्डों पर किया जा सकता है—उदाहरणः

  • निर्माण/उत्पत्ति के आधार पर: ऐतिहासिक घटना, पौराणिक आख्यान, सामाजिक घटना आदि।

  • प्रयोगकर्ता के आधार पर: स्त्रियों के मुहावरे, खेल जगत के मुहावरे, सैनिक मुहावरे, दलालों के मुहावरे आदि।

  • स्रोत के आधार पर: संस्कृत मूल, फारसी/तुर्की/पश्तो मूल, अंग्रेज़ी प्रभाव से बने मुहावरे आदि।

  • विषय के आधार पर: सामाजिक-संबंधी, स्वास्थ्य-विषयक, युद्ध-संबंधी आदि।


हिन्दी मुहावरों की परम्परा

हिन्दी में मुहावरों की परम्परा मुख्यतः संस्कृत से आरम्भ होकर पाली-प्राकृत-अपभ्रंश के माध्यम से विकसित हुई तथा मध्यकाल में फारसी-तुर्की-पश्तो प्रभावों और आधुनिक काल में अंग्रेज़ी प्रभाव से समृद्ध हुई। अतः हिन्दी में मुहावरों के प्रमुख स्रोत निम्नानुसार माने जा सकते हैं:

  1. संस्कृत

  2. पाली-प्राकृत-अपभ्रंश

  3. फारसी / तुर्की / पश्तो (मध्यकालीन प्रभाव)

  4. अंग्रेज़ी (आधुनिक प्रभाव)

  5. स्वदेशी/जनभाषाई विकास

कुछ शोधियों ने यह कहा कि संस्कृत में मुहावरे कम थे; परन्तु वास्तविकता यह है कि संस्कृत भी मुहावरों से समृद्ध रही है। कुछ संस्कृत उदाहरण हैं: मधुजिह्व (मधुरभाषी), तृणम्मन्ये (नाचीज़ समझना), हिरण्यवर्ण (निष्कपट), लोम्नि-लोम्नि (रोम-रोम में), मृत्यु-मुखात् प्रमुच्यते (मौत के मुंह से छूटना), पुष्पिताम् वाचम् (दिखावटी वाणी) आदि।

पाली-प्राकृत तथा अपभ्रंश भाषाओं में भी मुहावरे प्रचुर मात्रा में मिलते हैं—उदाहरण: मुहेसुमुद्दा (मुँह पर मुहर), भक्कड़-धुग्घिक (बन्दर-घुटकी) इत्यादि। ये परम्पराएँ संस्कृत → पाली-प्राकृत → अपभ्रंश → हिंदी के मार्ग से चलीं हैं।


प्राचीन हिन्दी कवियों में मुहावरों का प्रयोग

हिन्दी में आदिकाल से ही मुहावरों का प्रयोग मिलता है। गोरख, चंदबरदाई, विद्यापति, मुल्ला दाऊद आदि प्राचीन कवियों की रचनाओं में जनभाषा-संबंधी मुहावरे प्रचुर हैं। उदाहरणतः गोरखनाथ एवं मुल्ला दाऊद की भाषा जनभाषा के निकट होने के कारण उनमें मुहावरों का अधिक प्रयोग मिलता है। कबीर जनकवि हैं; उनकी भाषा जनभाषा से निकट है, इसलिए उनके काव्य में भी मुहावरों का पर्याप्त प्रयोग आता है—जैसे ‘अग लगना’, ‘कलेजे में छेद करना’, ‘दिल बाँधना’, ‘लम्बा पैर पसारना’, ‘शीश उठाना’ (शीश ऊँचा करना), ‘हाथ मलना’ आदि। कबीर की कुछ लोकोक्तियाँ और मुहावरे क्लासिकल व जनरूल दोनों का मिश्रण दिखाते हैं।

कबीर के कुछ उदाहरणात्मक प्रयोग:

  • “मोहि आरो वई क्याल क्या करि काहू कू समझाई…”

  • “कबीर गुरु गोरव मिला…”

  • “कबीर नौबत अपनी दिन दश लेह बजाई।”

कबीर में निश्चित तथा अनिश्चित संख्याओं के लिये प्रयुक्त मुहावरे भी मिलते हैं तथा उनका प्रयोग जनजीवन की अभिव्यक्ति से गहरा जुड़ा हुआ है।


निष्कर्ष (संक्षेप में)

मुहावरा भाषा-विशेष की एक रूढ़ अभिव्यक्ति इकाई है, जिसका प्रयोग प्रत्यक्षार्थ से हटकर लक्ष्यार्थ हेतु होता है। मुहावरों का जन्म सादृश्य, प्रतीक, हाव-भाव, शारीरिक अवस्थाएँ, ऐतिहासिक घटनाएँ तथा कल्पना पर आधारित होता है। हिन्दी मुहावरों की परम्परा प्राचीन-संस्कृत स्रोतों से आरम्भ होकर अनेक भाषाई प्रभावों के माध्यम से समृद्ध हुई है और जनभाषा के साथ-साथ साहित्यिक भाषाओं में भी अपने प्रभाव को संरक्षित किए हुए है।

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