| Author | Dr. Prerna Mathur |
| Genre | धार्मिक / Religious |
| Language | Hindi |
| Pages | 240 |
| File Size | 38 |
Book Summary
“उत्तररामचरितम्” महाकवि भवभूति द्वारा रचित एक कालजयी Sanskrit नाटक है, जिसका आधुनिक अध्ययन और प्रस्तुतीकरण डॉ. प्रेरणा माथुर ने किया है। यह ग्रंथ रामायण के उत्तरकांड पर आधारित है और भगवान श्रीराम के जीवन के बाद की घटनाओं, उनके आदर्श, त्याग और मानवीय संघर्षों का अद्भुत चित्रण प्रस्तुत करता है।
पुस्तक में भवभूति की साहित्यिक गहराई, भावनात्मक अभिव्यक्ति और संस्कृति की सुंदरता को सरल और स्पष्ट भाषा में प्रस्तुत किया गया है। यह विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, संस्कृत साहित्य प्रेमियों, और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे पाठकों के लिए एक मूल्यवान संसाधन है।
इस ग्रंथ का उद्देश्य भारतीय संस्कृति, आदर्श जीवन मूल्यों और राम की कथा से जुड़ी गूढ़ भावनाओं को हर पाठक तक पहुंचाना है। सुव्यवस्थित व्याख्या, उपयोगी संदर्भ और स्पष्ट प्रस्तुति के साथ यह किताब हिंदी व संस्कृत साहित्य के सभी प्रेमियों के लिए उपयोगी और पठनीय है।
Additional Information
उत्तररामचरित (कथासार)
प्रथमो अंक
रामराज्याभिषेक के अन्तर्गत जनक के चले जाने के उपरान्त सीता उदास रहती हैं। राम उन्हें सांत्वना देते हैं। इस बीच लक्ष्मण ने राम के अब तक के जीवन-घटनाओं का एक चित्रपट तैयार करवाया है। सीता, राम एवं लक्ष्मण के साथ वह चित्रपट देखती हैं तथा चित्रदर्शन से उत्पन्न भाव-प्रेरणा के कारण भगवती भागीरवी में अवगाहन करने की अभिलाषा व्यक्त करती हैं। चित्रदर्शन के श्रम से थक कर सीता सो जाती हैं।
इसी समय दुर्मुख नामक एक गुप्तचर, सीता के सम्बन्ध में लोक-प्रवृत्त पवित्र (पवाद) का समाचार लेकर राम के पास आता है। यह समाचार सुनकर राम को मन में पीड़ा होती है। एक ओर राज-धर्म का प्रश्न और दूसरी ओर कठोरगर्भा सीता की अवस्था—इन दोनों के बीच अन्ततः वे अपने कर्तव्य पालन का निश्चय करते हैं। लोक-मनोरंजन हेतु अपनी प्राणप्रिय पत्नी का परित्याग करने के कृतसंकल्प के साथ राम लक्ष्मण को सीता के निर्वासन का आदेश देते हैं। भागीरथी दर्शन की इच्छा सीता को स्वयं भी थी; परन्तु उसी इच्छा की पूर्ति के बहाने उसे निर्वासित कर दिया जाता है।
द्वितीय अंक
इस भाग में आत्रेयी नामक तपस्विनी और वनदेवता वासंती के संवाद के माध्यम से अनेक घटनाओं की सूचना दी जाती है। आत्रेयी महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रहकर अध्ययन करती थी; किन्तु वहाँ अध्ययन-संबंधी विघ्नों के कारण उसे दण्डकवन में आना पड़ा। वह महर्षि बाल्मीकि को दो अद्भुत बालकों—कुश और लव—के होने की सूचना देती है, जो अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि संपन्न थे और जिनके साथ अन्य बालकों को भी पढ़ाने की योग्यता बतलाई जाती है।
आत्रेयी यह भी सूचित करती है कि सीता का निर्वासन हो गया है तथा राम के अश्वमेध यज्ञ के आरम्भ का समाचार देती है, जिसमें राम स्वर्णमयी सीता की मूर्ति से धर्म-प्रचारिणी का भाव ग्रहण करेंगे। इसके पश्चात् वह बताती है कि सीता के निर्वासन के कारण दुःख-संतप्त वशिष्ठ, माता अरुंधती और कौशल्या आदि माताएँ दामाद के यज्ञ से लौटने पर अयोध्या न जाकर वाल्मीकि के आश्रम में पहुँच गईं।
वासंती को शम्बूक नामक शूद्र के दण्डकारण्य में तप करने की सूचना प्राप्त होती है, जिससे उसमें राम के पुनर्दर्शन की आशा जागृत होती है। शम्बूक की खोज करते हुए राम दण्डकवन में प्रवेश करते हैं और शम्बूक का वध करते हैं। दण्डकवन के सौन्दर्य का अवलोकन करते-करते राम सीता की स्मृति में व्याकुल होते जाते हैं। अन्ततः राम पंचवटी में प्रवेश करते हैं।
तृतीय अंक
तमसा और मुरला नामक सखियाँ परस्पर संभाषण में बताती हैं कि जब लक्ष्मण द्वारा सीता को वाल्मीकि आश्रम के पास निर्वासित किया गया, तब सीता लक्ष्मण के जाने के बाद शोकविह्वल होकर गंगा में कूद पड़ीं। वहीं जल में लव-कुश का जन्म हुआ। गंगा और पृथ्वी ने सीता को रक्षित कर लिया तथा बालकों को गंगा देवी ने महर्षि वाल्मीकि को सौंप दिया। इसके पश्चात् सीता छाया रूप में प्रकट होती हैं।
राम पंचवटी में प्रवेश करते हैं परन्तु सीता को देख नहीं पाते। उनके हृदय में सीता-विरह की वेदना तीव्र हो चुकी है। पुरानी क्रीड़ास्थलों को देखकर राम मूर्छित-सा हो जाते हैं, तब सीता अपने स्पर्श से उन्हें प्राणप्रिय चेतना दिलाती हैं। यद्यपि राम सीता को न देख पाते, परंतु स्पर्श से उन्हें आश्वस्ति होती है कि यह स्पर्श केवल सीता का ही है। बातचीत के प्रसंग में वासंती राम को सीता के निर्वासन पर निन्दा करती है। राम, सीता के विषय में प्रमुदित कंठ से विलाप करते हैं।
चतुर्वनामक
वाल्मीकि आश्रम में दो तपस्वी बालक परस्पर संवाद करते हुए प्रवेश करते हैं। वहीं वशिष्ठ और अरुंधती राम की माताओं के साथ पहले से ही वहाँ आ चुके थे। इसी समय जनक का आगमन होता है—वे सीता के निर्वासन से अत्यन्त दुःखी हैं। अरुंधती के साथ कौशल्या उनसे सांत्वना देती हैं। इस अवसर पर अन्य बालक-समूहों के साथ लय का प्रवेश होता है। कौशल्या और जनक उसे देखकर उसकी पहचान जानने की उत्कंठा में लगते हैं। लव आकर उनका अभिवादन करता है और स्वयं को वाल्मीकि के शिष्य के रूप में परिचय देता है। इस बीच अश्वमेध के अश्व के दर्शन के लिये वटु (अश्वरक्षक) बुलाते हैं; लय वहाँ जाकर अश्वरक्षकों की घोषणा सुनता है। उसे सुनकर लव को क्रोध आता है और वह अश्वमेध यज्ञ के अश्व को पकड़ लेता है।
पञ्चम अंक
लय की बाण-वर्षा से सैनिक विचलित हो उठते हैं। इसी बीच कुमार चंद्रकेतु युद्ध-क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। वे प्रथम दर्शन में ही सारथि सुमंत्र द्वारा वर्णित लव की वीरता, क्रोध और ओजपूर्ण व्यक्तित्व की प्रशंसा करते हैं। तत्पश्चात् दोनों का युद्ध आरम्भ होता है। लव ने जृम्भकास्त्र (विशेष अस्त्र) का प्रयोग किया, जिसे देख सुमंत्र और चंद्रकेतु दोनों विस्मित होते हैं। युद्धविराम के पश्चात् दोनों मिलते हैं और उनमें अनुराग (स्नेह-संबन्ध) का उद्भव होता है। संवाद में सुमंत्र रामभद्र की चर्चा करते हैं।
लव अपनी इस क्रिया (अश्व-हस्तगत करना) का कारण रक्षकों द्वारा दर्शायी गई ‘राक्षसीय’ वृत्ति बतलाते हैं। तत्पश्चात् लव तथा चंद्रकेतु के मध्य परस्पर दर्पपूर्ण प्रतिस्पर्धा हुई और दोनों पुनः युद्ध-क्षेत्र में उतरने के लिये प्रस्तुत होते हैं।
षष्ठ अंक
लव और चंद्रकेतु के युद्ध का वर्णन एक विद्याधर एवं उसकी पत्नी के संवाद के रूप में प्रस्तुत है। इस युद्ध में दोनों ऐকে—आग्नेय, वारुण तथा वायव्य—अस्त्रों का प्रयोग करते हैं। इसी मध्य शम्बूक का वध हो जाने के बाद रामचंद्र युद्ध-स्थल पर पहुँचते हैं तथा युद्ध स्वतः विरामित हो जाता है। लव को देखकर राम वात्सल्य से परिपूर्ण हो उठते हैं। चंद्रकेतु, लय द्वारा प्रयुक्त जुग्भकास्त्र के संबंध में राम को सूचित करता है; यह जानकर राम आश्चर्यचकित हो उठते हैं।
तब तक कुश भी प्रवेश करते हैं; दोनों राम को प्रणाम करते हैं और राम उनका आलिंगन करते हैं। इन बालकों के दर्शन से राम को आशंका होती है—क्या ये वास्तव में सीता के पुत्र हैं? कुश और लव द्वारा सीता-परित्याग सम्बन्धी कुछ श्लोकों का पाठ सुनकर राम की वेदना और भी तीव्र हो जाती है। सेना के साथ लव के युद्ध करने का समाचार मिलते ही वशिष्ठ, वाल्मीकि, जनक, अरुंधती तथा राम की माताएँ वहाँ उपस्थित हो जाती हैं। उनके आगमन से राम को लज्जा और खेद दोनों ही होता है; वे बालकों को अपने आगोश में लेकर उनका स्वागत करते हैं।
सप्तम अंक
एक दिव्य नाटक का अभिनय होता है। परित्यक्त सीता गंगा में कूद पड़ती हैं; किंतु एक शिशु को गोद में लेकर भागीरथी एवं पृथ्वी द्वारा सीता को जल से बाहर निकालकर प्रकट किया जाता है। पृथ्वी राम की कठोरता की निन्दा करती है; गंगा उसका कारण बतलाती है। दोनों (पृथ्वी और गंगा) सीता को आदेश देती हैं कि तुम इन शिशुओं की रक्षा तब तक करो जब तक वे वाल्मीकि मुनि के संरक्षण के योग्य बड़े न हो जाएँ। यह दृश्य वास्तविक समझकर राम शोक-वेग से मूर्छित हो जाते हैं। तब नेपथ्य में सुना जाता है—“देवि अरुंधती! हम पृथ्वी और गंगा—दोनों पवित्र व्रत वाली वधू—सीता को आपको अर्पण कर रहे हैं। आप हमें अनुग्रह प्रदान करें।” यह वाक्य सुनाई पड़ता है। अरुंधती सीता को लेकर प्रवेश करती हैं। सीता स्वामि की परिचर्या कर उन्हें स्वस्थ करती हैं। वाल्मीकि भी लव–कुश को समर्पित कर देते हैं। इसी बीच लवणासुर का वध कर शत्रुब्न भी आते हैं। चारों ओर प्रसन्नता और आनन्द का वातावरण व्याप्त हो जाता है।
संक्षेप-परिणाम
उपरोक्त कथासार में उत्तररामचरित के प्रमुख अंक—सीता का निर्वासन, वाल्मीकि आश्रम में लव-कुश का उद्भव, राम का अश्वमेध व युद्ध, और अन्ततः दिव्य नाटकीय परिदृश्य—को सुव्यवस्थित रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह कथा पारम्परिक रामायण की अनुक्रमिक घटनाओं का पुनर्प्रस्ताव है, जिसमें मानवीय भाव–विचार, राजधर्म, बाल्य-वीरता और दिव्यता का सम्मिलित चित्र उभर कर आता है।
