Ramcharitmanas :  Goswami Tulsidas | रामचरितमानस : गोस्वामी तुलसीदास

0
63
रामचरितमानस by गोस्वामी तुलसीदास
AuthorGoswami Tulsidas
Genreधार्मिक / Religious
LanguageHindi
Pages1240
File Size73
Click to rate this post!
[Total: 0 Average: 0]

Book Summary

“रामचरितमानस” गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित एक कालजयी और लोकप्रिय महाकाव्य है, जिसमें भगवान श्रीराम के जीवन, संघर्ष, आदर्श और भक्ति की प्रेरणादायक कथा को अत्यंत सुंदर भाषा और भाव-प्रवाह के साथ प्रस्तुत किया गया है। यह ग्रंथ भारतीय संस्कृति, धर्म और नैतिक मूल्यों का प्रभावशाली दर्पण है, जिसे हर वर्ग के पाठक सरलता से समझ सकते हैं।

इस महाकाव्य में श्रीराम के जीवन के प्रमुख प्रसंगों—जन्म, वनवास, रावण वध, सीता की अग्नि परीक्षा और राम-राज्य की स्थापना का भावपूर्ण और शिक्षाप्रद वर्णन मिलता है। तुलसीदास जी की भाषा, छंद, और शैली इसे पढ़ने योग्य, प्रेरक और हृदयस्पर्शी बनाती है।

“रामचरितमानस” सिर्फ धार्मिक पुस्तक नहीं, बल्कि भारतीय समाज की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर है। यह विद्यार्थियों, शोधार्थियों, साहित्य प्रेमियों और प्रत्येक व्यक्ति के लिए मार्गदर्शक का कार्य करती है। स्पष्ट और सुगम भाषा के कारण यह पुस्तक घर-घर में सम्मानित स्थान रखती है।

Additional Information

गोस्वामी तुलसीदासजी को रामायण से बढ़ कर हिन्दी साहित्य में दूसरा कोई ग्रन्थ नहीं है। ऐसा कौन साहित्य-ज्ञ बनीग होगा जो रामचरितमानस से थोड़ा-बहुत परिचय न रखता हो? इसका भादर भारतवर्ष के कोने-कोने में — राजाधिराजों के महलों से लेकर क्षेकर कंगाल की झोपड़ी तक — प्रचार है, और प्रचार में भी यह वाल्मीकीय से कहीं अधिक फैल चुका है। विविध मतानुयायी और भिक्षु-धर्म आचार्य भी आदरपूर्वक इसके उपदेशों से लाभ उठाते हैं। अनेक भाषाओं में अनूदित है; यह भिन्न-भिन्न देशों में सम्मान पा रहा है। भारतीयों में तो कितने ही भावुक जन ऐसे हैं जो रामचरितमानस का पाठ किए बिना दिन तक नहीं मानते।

इसके ओजस्वी और मार्मिक उपदेशों द्वारा अनेक स्त्री-पुरुष अनैतिक प्रवृत्तियों से मुक्त होकर सदाचारी बने हैं तथा बनते जा रहे हैं। रामभक्तों के लिये यह ग्रन्थ सदस्य-प्राणाधार है। इस लोकप्रसिद्ध महाकाव्य की अनावश्यक प्रशंसा करना ऐसा है जैसे मध्यह्रदय के अँधेरे में किसी को दीपक हाथ में दिखा देना — अतिशयोक्ति नहीं, पर प्रशंसनीय है।

यद्यपि गोसाईंजी ने रामायण की रचना अत्यन्त सरल, सुलभ भाषा में की है — न तो उन्होंने जटिल अर्थों का प्रयत्न किया और न कठिनता अथवा पाण्डित्य-प्रदर्शन के लिये दृष्टिकूट आदि का उपयोग किया — परन्तु रामायण के अर्थ की गंभीरता इतनी अधिक है कि इससे संबंधित कितनी ही टीकाएँ हो चुकीं और होती ही जा रही हैं। अनेक विद्वान विभिन्न प्रकार की अनोखी व्याख्याओं से उसकी शोभा बढ़ाने का प्रयास करते हैं; परन्तु अन्ततः कुछ भी निश्चित नहीं हुआ और रामचरितमानस की गूढ़ता यथावत बनी हुई है। जहाँ विज्ञानी अपनी मनोहर कल्पनाओं से पाठकों का मनोरंजन करते हैं, वहीं अनभिज्ञ और कथक-प्रेमी लोग अनावश्यक अर्थों का निर्माण करने में नहीं चूकते। कई संशोधकों व प्रकीरकों की छटाई-छाँट से पाठ में परिवर्तनीयताएँ आ गईं; कुछ कवियों ने बीच-बीच में अतिरिक्त काण्ड जोड़कर मूल कृति का रूप बदलने का प्रयत्न किया। किसी ने अर्धलील चौपाइयों को हटाकर पिंगल की योग्यता दिखाने का प्रयास किया और कविकृत रामायण के रूप में प्रस्तुत किया। इस प्रकार सहस्रों विद्यावारिधियों ने रामचरितमानस में अप्रासंगिक विषयों को बलपूर्वक शामिल कर इसे विकृत किया, जिससे मूल और छापक (प्रकाशित) पाठ का निर्णय साधारण हिन्दी जानेवालों और बड़े-बड़े विद्वानों दोनों के लिये कठिन हो गया है।

इस अनर्थकारी कार्य में स्वार्थलोलुप पुस्तक-विक्रेताओं और प्रकाशकों का भी हाथ है। काव्य-सौन्दर्य भले ही नष्ट हो जाए और गोसाईंजी के सिद्धान्तों का विकर्षण हो, पर उनसे उद्देश्य सिद्ध हो जाना चाहिए — विक्रेता-प्रकाशक का लक्ष्य तो केवल बिक्री और लाभ है। दोपक और आठवें काण्ड के बिना कई ग्राहक पुस्तक खरीदना पसंद नहीं करते। इन महाशयों ने लेखकों और टीकाकारों को प्रलोभन देकर आनन-फानन “दो-पक” (अतिरिक्त काण्ड) मिलवाए; रामायण तथा उसके रचयिता की मान-कीर्ति की परवाह न करके केवल पाठकों की रुचि के अनुसार और अपनी बिक्री बढ़ाने के विचार से रामचरितमानस को विकृत किया गया।

हर्ष की बात है कि कुछ विद्वानों ने कविकृत मूल-पाठ की खोज में सराहनीय उद्योग किया और अच्छे प्रतिष्ठित प्रकाशकों ने उनका दायित्व ग्रहण किया। जहाँ पहले तक अनेक मिश्रित पाठों सहित रामायण छापी जाती रही, वहाँ अब मूल, छापक-रहित पाठ की प्रति का आदर होने लगा है और दो-काण्ड (अतिरिक्त काण्ड) से लोग घृणा करने लगे हैं।

अपने समय के प्रसिद्ध रामायणी और परम-भक्त मिर्ज़ापुर निवासी पण्डित रामगुलामजी द्विवेदी ने गोसाईंजी के छोटे-बड़े बारहों ग्रन्थों के मूल-पाठ खोज निकालने का विशेष प्रयत्न किया और इस कार्य में उन्हें सफलता भी मिली। इनके संशोधित रामचरितमानस के आधार पर दीपक-रहित गुटका के रूप में शुद्ध पाठ १९४७ (उल्लेखित वर्ष पाठ में भिन्न है; मूल पाठ में १४४७ अंकित) में प्रकाशित हुआ। हमने अपनी टीका में इसी गुटका के अनुसार मूल-पाठ लिया है। द्विवेदीजी के समकालीन पं. बन्दन पाठक, प्रो. ईश्वर प्रसाद और लाला डंकनलाल आदि रामायण-प्रेमियों ने भी इस पाठ को विशुद्ध व स्वीकार्य माना है।

नागरी प्रचारिणी सभा की एक प्रति १८६६ ई. में प्रकाशित हुई; इसी सटीक प्रति के मूल-पाठ का स्थानीय अवलम्बन हमने अपनी टीका में किया है और इसे ‘सभा की प्रति’ के नाम से संदर्भित किया है। सभा की प्रति में भी पाठान्तर विद्यमान है — इसका हमें अयोध्या काण्ड में विशेष रूप से अनुभव हुआ है। गुटका का पाठ अधिकांश मिश्रित पाठों से मिलता है; किन्तु सभा की प्रति का पाठ उससे कुछ भिन्न पाया गया। इसी प्रकार उत्तरकाण्ड में पाठान्तर की अधिकता है, जिसका स्थान-स्थान पर टीका में उल्लेख किया गया है। यह पुस्तक-लोकन करने वाले समर्थ पाठकों को विदित रहेगा।

गोस्वामीजी के हस्तलिखित अयोध्या काण्ड की प्रति जो अब तक राजापुर के मन्दिर में सुरक्षित थी, अवधवासी लाला सीताराम (B.A.) ने उद्योगपूर्वक उसकी अक्षरशः प्रतिलिपि प्रकाशित करायी है। अयोध्या काण्ड का पाठ हमने इसी प्रति के अनुसार रखा है। अन्तर इतना है कि गोस्वामीजी ने अवधी और बैसवाड़ी भाषा तथा उस समय की लेख-प्रणाली के अनुसार शब्दों को मात्रायुक्त लिखा है — जैसे राम को रामु, भरत को भरतु, जन को जनु, मन को मनु, धन को चंु (चनु), घना के स्थान पर घतु इत्यादि; तथा ‘या’ के स्थान पर प्रायः ‘प’ का प्रयोग देखा गया है — लखि → लपि, सुख → सुष, दुख → तुप आदि। ‘मोरे, तारें, हमारें, तुम्हारे, पहिचाने, सयाने’ आदि शब्दों पर विन्दु (अल्पविराम / उच्चारण चिह्न) लगाए गए हैं।

गोस्वामीजी ने भाषा-लेखन में ‘य’ और ‘श’ का भेद प्रायः त्याग दिया तथा ‘व’ के स्थान पर अधिकांशतः ‘व’ का उपयोग किया। हमने पूर्णरूपेण इसका अनुकरण नहीं किया, पर लेखनशैली के अनुसार शब्दों के रूप रखा हैं; इससे न तो शब्द का रूप बदला है और न अर्थ-लालित्य में कोई अंतर आया है। ‘ण’ और ‘श’ का प्रयोग हमने भी नहीं किया। सम्भव है कि हिन्दी के प्रारम्भिक आलोचकों के लिये यह परिवर्तन आपत्ति का कारण बने और कुछ कष्ट उठाना पड़े; इसके लिए क्षमा याचनीय है।

उपयुक्त तीनों प्रतियों के अतिरिक्त किसी अन्य स्रोत से पाठ नहीं लिया गया और न ही कहीं मनमाना तोड़-मरोड़ करके अपना पाण्डित्य दर्शाने का प्रयास किया गया। हाँ—कारण्य काण्ड में “मरम बचन जब”

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here