Discovery of India : Jawaharlal Nehru  | भारत की खोज : जवाहरलाल नेहरू

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Bharat Ki Khoj
AuthorJawaharlal Nehru
GenreHistory
LanguageHindi
Pages400
File Size12
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Book Summary

“भारत की खोज” पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखित एक महान ऐतिहासिक और साहित्यिक ग्रंथ है, जिसमें भारत के अतीत, संस्कृति, परंपराओं और स्वतंत्रता संग्राम की यात्रा को सरल और प्रभावशाली भाषा में प्रस्तुत किया गया है। इस किताब में नेहरू जी ने भारत के विविध पक्षों, सभ्यता, धर्म, कला, विज्ञान और समाज के विकास को नजदीक से समझने का क्रमिक प्रयास किया है।

यह पुस्तक खासतौर पर विद्यार्थियों, इतिहास प्रेमियों, शोधकर्ताओं और सभी पाठकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो भारत की जड़ों को जानने और समझने में रुचि रखते हैं। इसमें न केवल ऐतिहासिक घटनाओं का विवरण मिलता है, बल्कि लेखक की दृष्टि से भारत के भविष्य और राष्ट्रीय चरित्र का भी अनुमान प्रस्तुत किया गया है।

“भारत की खोज” का उद्देश्य भारतीय सभ्यता की विविधता और महानता को उजागर करना और पाठकों को देश, संस्कृति और मानवता की ओर अग्रसर करना है। भावपूर्ण भाषा, प्रमाणिक तथ्य और विस्तार से की गई व्याख्या इसे अधिक पठनीय और विश्वसनीय बनाती है।

Additional Information

शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को बेहतर इंसान बनाना है। शिक्षा मनुष्य का शारीरिक, मानसिक, भावात्मक और नैतिक—चारों दिशाओं में विकास करती है तथा उसे संपूर्णता प्रदान करती है। यह तभी संभव है जब बच्चों में प्रारम्भिक अवस्था में ही ऐसे मूल्यों के बीज बो दिए जाएँ, जिनके आधार पर वे बौद्धिक और कल्पनात्मक क्षमताओं का समुचित उपयोग करना सीख सकें।

परिषद् सदैव बच्चों में अध्ययन की क्षमता तथा रुचि—दोनों के विकास के लिये तत्पर रही है और समय-समय पर इस क्षेत्र में विविध प्रयास एवं प्रयोग करती रही है। निर्धारित पाठ्यक्रम की पुस्तकों के अतिरिक्त परिषद् ने बच्चों में अध्ययन-प्रवृत्ति को विकसित करने हेतु पूरक अध्ययन सामग्री तथा उसके अंतर्गत अनेक पुस्तक-मालाएँ और परियोजनाएँ आरम्भ की हैं। इन सभी प्रयासों का मूल उद्देश्य बच्चों को पुस्तकों से मित्रता कराना है।

पूरक अध्ययन सामग्री का प्रकाशन इस विचार से प्रारम्भ हुआ कि बच्चों को पाठ्यपुस्तकों की एकरसता से अलग हटकर ऐसी सामग्री दी जानी चाहिए जो कथ्य और कला—दोनों ही दृष्टियों से समृद्ध हो, और परोक्ष रूप से वांछित मानवीय मूल्यों को भी उनमें प्रतिष्ठित करे। इसी दिशा में आगे बढ़ने वाला एक और महत्त्वपूर्ण प्रयास है—‘अतिरिक्त पठन योजना’

इस योजना के अंतर्गत प्रकाशित पुस्तकें बालकों को भारतीय संस्कृति के विविध आयामों, विज्ञान और अन्य विषयों की जानकारी देने के साथ-साथ साहित्यिक और कलात्मक विरासत का परिचय भी कराती हैं। इन पुस्तकों के माध्यम से उन्हें विभिन्न कार्यक्षेत्रों के नायकों और महापुरुषों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का विस्तृत ज्ञान प्राप्त होता है।

इस योजना को समय-समय पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केन्द्र के अवकाश-प्राप्त अध्यक्ष प्रो. नामवर सिंह का विशेष मार्गदर्शन प्राप्त हुआ है—जिसके लिये परिषद् उनके प्रति आभारी है। सामाजिक विज्ञान एवं मानविकी शिक्षा विभाग के अध्यक्ष प्रो. अर्जुन देव ने इस योजना को नई दिशा प्रदान करने में अमूल्य योगदान दिया है। प्रो. रामजन्म शर्मा ने इस योजना के अंतर्गत प्रकाशित होने वाली पुस्तकों का संयोजन किया और पांडुलिपियों को अंतिम रूप प्रदान किया। परिषद् इन सभी के प्रति हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करती है।

इसी योजना के अंतर्गत अब “भारत की खोज” (Abridged Edition) पुस्तक तैयार की गई है, जिसका उल्लेखनीय सम्पादन एवं अनुवाद प्रो. निर्मला जैन द्वारा किया गया है। परिषद् श्रीमती सोनिया गांधी तथा जवाहरलाल नेहरू स्मारक निधि के प्रति हार्दिक आभार प्रकट करती है, जिन्होंने इस पुस्तक के प्रकाशन की अनुमति प्रदान की।

इस योजना के अंतर्गत प्रकाशित पुस्तकों को और भी उपयोगी बनाने के लिये पाठकों द्वारा दिए गए प्रत्येक सुझाव का परिषद् स्वागत करेगी।

अशोक कुमार शर्मा
निदेशक
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्
नई दिल्ली


सम्पादन और अनुवाद

जवाहरलाल नेहरू ने तीन कालजयी कृतियों की रचना की—‘विश्व साहित्य की झलकियाँ’, ‘आत्मकथा’ और ‘भारत की खोज’। इनमें से पहली कृति यद्यपि इंदिरा गांधी (तब इंदिरा नेहरू) के लिए लिखी गई थी, परंतु उससे भारत ही नहीं, विश्व के युवा मन को मानव इतिहास की समझ मिली। उनकी ‘आत्मकथा’ भी केवल उनकी निजी जीवन-कथा न होकर नवीन भारत की मानसिक बनावट को समझने की अंतर्दृष्टि प्रदान करती है।

‘भारत की खोज’ की प्रस्तावना में इंदिरा गांधी ने लिखा—
“इस रचना में भारत के राष्ट्रीय चरित्र के स्रोतों की गहरी पड़ताल की गई है।”

यह पुस्तक 1944 में अप्रैल से सितंबर के बीच अहमदनगर किले की जेल में लिखी गई। इसे नेहरू ने 9 अगस्त 1942 से 28 मार्च 1945 तक अपने साथ रहे साथियों और सहयात्रियों को समर्पित किया। तिथियों का यह चयन केवल संयोग नहीं है, बल्कि उस ऐतिहासिक दौर और उसकी घटनाओं के प्रति नेहरू की गहरी संवेदना का प्रतीक है।

पुस्तक की भूमिका में नेहरू ने कारावास में अपने इन साथियों को अत्यंत सम्मानपूर्वक स्मरण किया है। जेल-जीवन की कठिनाइयों के बावजूद वे इन्हें असाधारण रूप से योग्य, सुसंस्कृत और सौम्य व्यक्तित्व मानते थे। उन्होंने बताया कि ये साथी न केवल विभिन्न राजनीतिक दृष्टिकोणों, बल्कि भारतीय विद्वत्ता, प्राचीन और नवीन भारत तथा तत्कालीन भारतीय जीवन के सभी पक्षों के प्रतिनिधि थे। उनका संबंध संस्कृत, पाली, अरबी, फ़ारसी जैसी प्राचीन भाषाओं तथा हिन्दी, उर्दू, बंगाली, गुजराती, मराठी, तेलुगु, सिन्धी और उड़िया जैसी आधुनिक भाषाओं से था।

नेहरू ने लिखा—
“मेरे सामने यह सम्पूर्ण विद्या-सम्पदा उपस्थित थी और एकमात्र बाधा इसका लाभ उठाने की मेरी सीमित क्षमता थी।”

उन्होंने मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, गोविन्द बल्लभ पंत, नरेन्द्र देव और आसफ़ अली के प्रभावशाली व्यक्तित्व का विशेष रूप से उल्लेख किया है।

इतिहास और संस्कृति के विभिन्न पक्षों पर बंदी साथियों के साथ हुई अंतहीन चर्चाओं ने नेहरू को अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करने में सहायता की। उन्होंने इस ऋण को भी कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार किया है।


सम्पादन नीति

मूल रचना के इस संक्षिप्त संस्करण को तैयार करते समय प्रमुख उद्देश्य यह रहा कि रचना का मूल कथ्य सुरक्षित रहे। इसमें घटना–क्रम के स्थान पर एक सांस्कृतिक यात्रा, एक मानसिक और ऐतिहासिक अन्वेषण है—जिसे ज्यों-का-त्यों रखा गया है।

चयन करते समय दो प्रकार के प्रसंगों को सम्मिलित नहीं किया गया—

  1. नितांत पारिवारिक घटनाएँ
    —मुख्यतः दूसरे अध्याय की सामग्री, जिसमें कमला नेहरू के विवाह से मृत्यु तक का वर्णन है।
  2. दीर्घ ऐतिहासिक विवरण
    —जैसे पाँचवें अध्याय में ‘भारत और ईरान’, ‘भारत और यूनान’ आदि शीर्षकों के अंतर्गत दी गई विस्तृत सामग्री।

संक्षिप्त संस्करण के संभावित पाठक-वर्ग की अपेक्षा और समझ को ध्यान में रखते हुए अनुवाद को पठनीय, सुबोध, ज्ञानवर्धक और प्रवाहपूर्ण बनाने का प्रयास किया गया है ताकि पाठक मूल कृति की संवेदना को अखण्ड रूप में ग्रहण कर सकें।

आशा है, पाठक इस कृति को उसी रूप में ग्रहण करेंगे, जिसमें इसे प्रस्तुत करने का हमारा प्रयत्न रहा है।

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