हितोपदेश की नीति कथाएं (Hitopadesh Stories)
हितोपदेश की नीति कथाएं (Hitopadesh Stories) — अध्याय 1
कौआ और दुष्ट सर्प (The Crow and the Serpent)
फ़ॉन्ट:
एक विशाल बरगद के वृक्ष पर एक कौआ और उसकी पत्नी रहते थे। उसी वृक्ष के खोखले तने में एक दुष्ट काला सर्प भी आ बसा। जब भी कौवी अंडे देती, वह निर्दयी सर्प चुपके से अंडों और नवजात बच्चों को खा जाता था।
कौआ और कौवी अत्यंत दुखी हुए। कौए ने अपने मित्र बुद्धिमान गीदड़ से जाकर सहायता मांगी, "मित्र! हम उस सर्प के अत्याचार से कैसे मुक्ति पाएं?"
गीदड़ ने कहा, "मित्र! बल से जो कार्य न हो सके, उसे बुद्धि और कौशल से सिद्ध किया जाता है।" उसने कौए को एक योजना समझाई।
योजनानुसार, कौआ उड़कर पास के राजमहल के सरोवर पर गया, जहाँ राजा की पटरानी अपनी सखियों के साथ स्नान कर रही थी। रानी ने अपना बहुमूल्य मोतियों का हार किनारे एक पत्थर पर उतार कर रखा था।
कौआ झपट्टा मारकर वह मोतियों का हार चोंच में दबाकर उड़ चला। रक्षक सैनिकों ने देखा तो वे लाठियां और तलवारें लेकर कौए के पीछे दौड़े।
कौआ सीधा अपने बरगद के वृक्ष पर पहुंचा और उसने वह मोतियों का हार सीधे उस सर्प के बिल (खोखल) के भीतर गिरा दिया।
जब सैनिक वृक्ष के पास पहुंचे और बिल में हार निकालने लगे, तो फुफकारता हुआ काला सर्प बाहर निकला। सैनिकों ने अपने प्राणों की रक्षा और हार प्राप्त करने हेतु तुरंत लाठियों से उस विषैले सर्प को मार डाला। इसके बाद वे हार लेकर महल लौट गए।
इस प्रकार कौआ और कौवी उस दुष्ट सर्प के भय से सदा के लिए मुक्त हो गए और सुखपूर्वक रहने लगे।
शिक्षा: युक्ति और बुद्धिमत्ता से बड़ी से बड़ी बाधा और बलशाली शत्रु को भी परास्त किया जा सकता है।
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